भोजशाला विवाद: दिग्विजय सिंह का बयान और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका
'हिंदू-मुस्लिम मुद्दे को उभारना ठीक नहीं', भोजशाला केस में HC के फैसले पर दिग्विजय सिंह ने पकड़ी अलग लाइन
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भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के हालिया फैसले के बाद कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि पूजा की अनुमति का अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट को करना चाहिए। हिंदू और मुस्लिम पक्ष दोनों ही इस फैसले को चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं, जिससे मामला एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है।
- 01दिग्विजय सिंह ने कहा कि एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारक में पूजा की अनुमति का फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना चाहिए।
- 02हिंदू पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट याचिका दाखिल की है, जिसमें बिना उनकी बात सुने कोई फैसला न लेने का अनुरोध किया गया है।
- 03सिंह ने एएसआई की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि वाग्देवी की मूर्ति का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
- 04उन्होंने ब्रिटिश म्यूजियम में रखी वाग्देवी की मूर्ति को भारत वापस लाने की आवश्यकता जताई।
- 05सिंह ने कहा कि देश को आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में धार्मिक मुद्दों को उभारना उचित नहीं है।
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भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के हालिया फैसले ने एक बार फिर सियासी और कानूनी बहस को जन्म दिया है। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि इस मामले में पूजा की अनुमति का अंतिम निर्णय भारतीय सुप्रीम कोर्ट को करना चाहिए। उन्होंने एएसआई द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें वाग्देवी की मूर्ति का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। हिंदू पक्ष ने इस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट में कैविएट याचिका दाखिल की है, जबकि मुस्लिम पक्ष भी इस निर्णय को चुनौती देने की तैयारी कर रहा है। दिग्विजय सिंह ने कहा कि इस मुद्दे को व्यापक संदर्भ में देखना आवश्यक है, क्योंकि देश में पहले से ही कई विवादित स्थल सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान में देश आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, और ऐसे समय में धार्मिक मुद्दों को उभारना उचित नहीं है। इस बीच, भोजशाला विवाद अब कानूनी लड़ाई के अगले चरण में प्रवेश करता दिख रहा है, जिससे यह मामला केवल ऐतिहासिक या धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का भी महत्वपूर्ण विषय बन गया है।
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भोजशाला विवाद से स्थानीय समुदायों के बीच धार्मिक तनाव बढ़ सकता है, जिससे सामाजिक सौहार्द पर असर पड़ सकता है।
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