Editorial: पश्चिम एशिया संकट से बढ़ी ऊर्जा चिंता, भारत के सामने कठिन चुनौती
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खबरों के मुताबिक अमेरिका ने गतिरोध दूर करने के संबंध में ईरान के नवीनतम प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। इसका अर्थ यह है कि पश्चिम एशिया में अनिश्चितता का सिलसिला जारी रहेगा और अभी तक इस बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है कि होर्मुज स्ट्रेट का अवरोध कब तक खुलेगा ताकि तेल और गैस का अबाध प्रवाह शुरू हो सके। दुनिया के कच्चे तेल का करीब 20 फीसदी हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है। 28 फरवरी को लड़ाई शुरू होने के बाद उस इलाके से बहुत कम तेल गुजर सका है और इसके चलते वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं। तेल कीमतों में इजाफा दुनिया के अधिकांश हिस्सों में कठिनाई पैदा कर रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। काफी देरी के बाद सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने पंप पर तेल कीमतों में इजाफा शुरू कर दिया है। कच्चे तेल की कीमतों में अचानक तेज इजाफा होने पर सरकार को हमेशा इस दुविधा का सामना करना पड़ता है कि वह बढ़ी हुई कीमत का भार झेले या उसे उपभोक्ताओं पर डाल दे। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने बुधवार को एक विश्लेषणात्मक पोस्ट प्रस्तुत की जिसमें कुछ नीतिगत संकेत हैं। आईएमएफ ने सही कहा है कि कोई भी एक समान समाधान सभी पर लागू नहीं होता। पश्चिम एशिया में छिड़े संघर्ष का प्रभाव ऊर्जा पर निर्भरता, बाजार संरचना और राजकोषीय क्षमता सहित कई कारकों पर निर्भर करता है। ऊर्जा की लगातार ऊंची बनी कीमतें आम परिवारों की क्रय शक्ति को प्रभावित कर सकती हैं और व्यवसायों पर दबाव डाल सकती हैं। हालांकि यदि सरकार की प्रतिक्रिया सावधानीपूर्वक तैयार नहीं की गई तो यह महंगी और उलझनभरी साबित हो सकती है। इसलिए राजकोषीय प्रतिक्रिया अस्थायी, उचित समय पर और लक्षित होनी चाहिए। सुझाव दिया गया है कि घरेलू ऊर्जा कीमतों को लागत के हिसाब से रहने दिया जाए। कमजोर परिवारों को अस्थायी और लक्षित सहायता दी जा सकती है, जबकि सक्षम छोटे व्यवसायों को मूल्य नियंत्रण के बजाय नकदी संबंधी उपायों के माध्यम से सहारा दिया जा सकता है। भारत में सरकार ने व्यवसायों को समर्थन देने के लिए ऋण गारंटी योजना की घोषणा की है। इसके साथ ही एयरलाइंस के लिए विशेष व्यवस्था भी की है। हालांकि उसने घरेलू कीमतों को अंतरराष्ट्रीय लागत को परिलक्षित करने की अनुमति नहीं दी है। उसने विशेष उत्पाद शुल्क घटा दिया है जिससे बजट पर सीधा असर पड़ेगा। अभी हाल तक ऐसी खबरें आ रही थीं कि तेल विपणन कंपनियां प्रतिदिन लगभग 1,000 करोड़ रुपये की अंडररिकवरी का सामना कर रही थीं। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में दो बार मामूली बढ़ोतरी किए जाने के बाद यह अंडररिकवरी कुछ कम हुई है। लेकिन अभी और कदम उठाने की जरूरत है क्योंकि अंततः तेल कंपनियों का घाटा सरकार की वित्तीय स्थिति को प्रभावित करेगा। कमजोर परिवारों को सहारा देने के सुझाव को भारतीय संदर्भ में लागू करना कठिन है क्योंकि लक्षित करने में मुश्किल आएगी। यह आंकना कठिन होगा कि किसी परिवार पर कितना असर पड़ा है और यह आसानी से राजनीतिक मुद्दा बना सकता है। उदाहरण के लिए सरकार 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त खाद्यान्न देती है जिसे उचित ठहराना मुश्किल है। इसके अलावा सरकार किसानों की रक्षा कर रही है और तर्कसंगत रूप से उपभोक्ताओं की भी क्योंकि उसने उर्वरक कीमतों को समायोजित करने की अनुमति नहीं दी है। कुल मिलाकर स्थिति को संभालने के लिए कोई आसान समाधान नजर नहीं आ रहा है। फिर भी सरकार को अधिक मूल्य समायोजन की अनुमति देनी होगी क्योंकि स्थिति और बिगड़ सकती है। विश्लेषकों का तर्क है कि अब तक ईरान संघर्ष का कीमतों पर सीमित प्रभाव रहा है क्योंकि देशों ने अपने भंडार का उपयोग किया है। लेकिन यह सिलसिला लंबे समय तक नहीं चलेगा। परिणामस्वरूप आने वाले हफ्तों में कीमतें काफी बढ़ सकती हैं और यदि संघर्ष जल्दी समाप्त नहीं होता है तो तेल और गैस की उपलब्धता एक समस्या बन सकती है। इसलिए भारतीय नीति-निर्माताओं को स्थिति का सामना करने में चुस्त रहना होगा। सभी ईंधन श्रेणियों के लिए मूल्य समायोजन, राजकोषीय समर्थन और आपूर्ति प्रबंधन का संयोजन अपनाना पड़ सकता है। व्यापक स्तर पर देखें तो दुनिया एक खंडित वैश्विक शासन प्रणाली की कीमत चुका रही है जिसमें कुछ देश एकतरफा युद्ध शुरू कर सकते हैं और बिना नतीजा भुगते पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को बंधक बना सकते हैं।




