सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी: कानूनी सहायता का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: लीगल एड सिर्फ औपचारिकता नहीं, आरोपित का अधिकार
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Image: Jagran
सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी सहायता के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा है कि यह केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि आरोपित का अधिकार है। मध्य प्रदेश के 74 वर्षीय नंदकिशोर मिश्रा के मामले में, कोर्ट ने न्याय मित्र की नियुक्ति को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए हैं, ताकि आरोपित को उचित कानूनी मदद मिल सके।
- 01सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानूनी सहायता केवल औपचारिकता नहीं होनी चाहिए, बल्कि आरोपित का वास्तविक अधिकार है।
- 02मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नंदकिशोर मिश्रा के मामले में न्याय मित्र नियुक्त किया, लेकिन उन्हें उचित समय और अवसर नहीं दिया गया।
- 03जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए दोबारा सुनवाई का आदेश दिया।
- 04सुप्रीम कोर्ट ने न्याय मित्र को मामले का अध्ययन करने और आरोपित से मिलने का पर्याप्त समय देने की आवश्यकता पर जोर दिया।
- 05कोर्ट ने निर्देश दिया कि नंदकिशोर मिश्रा की उम्र को देखते हुए, मामले की सुनवाई दो महीने के भीतर की जाए।
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सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी सहायता (लीगल एड) के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा है कि यह केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि आरोपित का अधिकार है। यह टिप्पणी मध्य प्रदेश के 74 वर्षीय नंदकिशोर मिश्रा के मामले में आई, जो हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। जब उनकी अपील पर सुनवाई के दौरान कोई वकील उपस्थित नहीं हुआ, तो मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक न्याय मित्र नियुक्त किया। हालांकि, न्याय मित्र को न तो मामले की जानकारी दी गई और न ही आरोपित से मिलने का अवसर मिला। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को अस्वीकार करते हुए कहा कि आरोपित को यह जानने का पूरा हक है कि उसकी पैरवी कौन कर रहा है। कोर्ट ने न्याय मित्र को मामले का अध्ययन करने और आरोपित से मिलने का पर्याप्त समय देने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके अलावा, मामले की सुनवाई को दो महीने के भीतर निष्पक्ष तरीके से करने का आदेश दिया।
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यह निर्णय कानूनी सहायता के अधिकार को मजबूत करेगा और सुनिश्चित करेगा कि आरोपितों को उचित कानूनी प्रतिनिधित्व मिले।
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