जमीयत उलेमा-ए-हिंद का वंदे मातरम को अनिवार्य करने के खिलाफ कोर्ट जाने का निर्णय
वंदे मातरम अनिवार्य करने के खिलाफ कोर्ट जाएगा जमीयत, मदनी बोले- ये इस्लाम के खिलाफ

Image: Aaj Tak
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने वंदे मातरम को अनिवार्य बनाने के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की घोषणा की है। उन्होंने इसे मुस्लिम धार्मिक विश्वासों के खिलाफ बताया और केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना की। मदनी ने कहा कि इस कदम का उद्देश्य मुसलमानों को डराना और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता को छीनना है।
- 01मौलाना अरशद मदनी ने वंदे मातरम को 'विवादित गीत' और 'मुसलमानों के खिलाफ' करार दिया है।
- 02सरकार ने सभी सरकारी और शैक्षणिक संस्थानों में वंदे मातरम के छह बंद गाना अनिवार्य किया है।
- 03मदनी ने कहा कि मस्जिदों और मदरसों को अवैध बताकर गिराया जा रहा है।
- 04उन्होंने आरोप लगाया कि नफरत की राजनीति अब डराने-धमकाने में बदल गई है।
- 05मदनी ने सभी इंसाफ पसंद पार्टियों और नागरिकों से एकजुट होने की अपील की है।
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जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने हाल ही में केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना की और वंदे मातरम को अनिवार्य बनाने के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने की घोषणा की। उन्होंने इसे मुस्लिम धार्मिक विश्वासों के खिलाफ बताते हुए कहा कि यह कदम मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता को छीनने का प्रयास है। मदनी ने कहा कि वंदे मातरम को 'विवादित गीत' करार दिया है, जिसे बीजेपी शासित राज्यों में अनिवार्य किया जा रहा है। इसके साथ ही, उन्होंने मस्जिदों और मदरसों पर हो रही कार्रवाई की भी निंदा की। मदनी ने आरोप लगाया कि देश में नफरत की राजनीति अब डराने-धमकाने की राजनीति में बदल गई है, जिसका उद्देश्य मुसलमानों को डराना है। उन्होंने सभी इंसाफ पसंद नागरिकों से अपील की कि वे सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ एकजुट हों और संविधान की रक्षा करें। मदनी ने यह भी कहा कि मौजूदा सरकार इस्लाम को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रही है, और उन्होंने मुस्लिम समुदाय के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखने का आश्वासन दिया।
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इस निर्णय से मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है और यह सामाजिक तनाव को बढ़ा सकता है।
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