‘वंदे मातरम्’ पर विवाद: गृह मंत्रालय की नई गाइडलाइन और मुस्लिम संगठनों की आपत्ति
वंदे मातरम् को लेकर क्या है गृह मंत्रालय की गाइडलाइन, मुसलमानों को क्यों है इस पर आपत्ति?

Image: Ndtv
‘वंदे मातरम्’ को लेकर केंद्र सरकार की नई गाइडलाइन ने एक बार फिर धार्मिक और राजनीतिक विवाद को जन्म दिया है। पश्चिम बंगाल में इसे मदरसों में अनिवार्य किया गया है, जबकि मुस्लिम संगठनों का कहना है कि यह उनके धार्मिक विश्वासों का उल्लंघन है। इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं।
- 01केंद्र सरकार ने ‘वंदे मातरम्’ के गायन के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिसमें इसे प्रमुख सरकारी कार्यक्रमों में अनिवार्य किया गया है।
- 02पश्चिम बंगाल सरकार ने मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ का गायन अनिवार्य कर दिया है, जिससे राजनीतिक विवाद बढ़ गया है।
- 03जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया है।
- 04केंद्र सरकार राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम 1971 में संशोधन पर विचार कर रही है।
- 05विभिन्न राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दी हैं, जिसमें कुछ ने इसे राष्ट्रवाद से जोड़ा है।
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‘वंदे मातरम्’ एक बार फिर राजनीतिक और धार्मिक बहस का केंद्र बन गया है, विशेषकर केंद्र सरकार की नई गाइडलाइन के बाद। गृह मंत्रालय ने इस गीत को प्रमुख सरकारी कार्यक्रमों में अनिवार्य करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिसमें कहा गया है कि इसे सभी सरकारी आयोजनों में गाया जाएगा। पश्चिम बंगाल की सरकार ने भी मदरसों में इसे अनिवार्य कर दिया है, जिससे विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं। मुस्लिम संगठनों का कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ का कुछ हिस्सा उनके एकेश्वरवादी धार्मिक विश्वासों से टकराता है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी ने इसे संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया है। इस विवाद के राजनीतिक पहलू पर भी चर्चा हो रही है, जहां कुछ नेता इसे हिंदुत्व और राष्ट्रवाद से जोड़ रहे हैं। केंद्र सरकार ने इस मुद्दे को लेकर राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम में संशोधन करने पर विचार किया है, जिससे ‘वंदे मातरम्’ को कानूनी सुरक्षा प्राप्त होगी।
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इस निर्णय से पश्चिम बंगाल के मदरसों में शिक्षा प्रणाली और धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रभाव पड़ेगा।
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