दीवाला कानून और कर नियमों में टकराव: कंपनियों के घाटे के लाभ पर नई चुनौतियाँ
टैक्स और दीवाला कानून में ठनी: पुरानी कंपनियों के खरीदारों को 'घाटे के लाभ' पर मिली तगड़ी चुनौती
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समाधान प्रक्रिया में फंसी कंपनियों के लिए दीवाला कानून और कर नियमों में टकराव ने नई अनिश्चितता पैदा कर दी है। विशेषज्ञों के अनुसार, कर अधिकारी कंपनियों को घाटे को आगे ले जाने के लाभ से इनकार कर रहे हैं, भले ही राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट (एनसीएलटी) ने योजनाओं को मंजूरी दी हो।
- 01दीवाला कानून और कर नियमों में टकराव से कंपनियों को नई चुनौतियाँ मिल रही हैं।
- 02कर अधिकारी कंपनियों के घाटे को आगे ले जाने के लाभ से इनकार कर रहे हैं।
- 03आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 79 के तहत शेयरधारिता में बदलाव की शर्तें हैं।
- 04समाधान योजना को मंजूरी से पहले कर अधिकारियों को सूचित करने की आवश्यकता नहीं है।
- 05कानूनों के बीच तालमेल की कमी इस समस्या की जड़ है।
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समाधान प्रक्रिया से गुजर रही कंपनियों के लिए दीवाला कानून और कर नियमों के बीच टकराव ने नई अनिश्चितता की स्थिति पैदा कर दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि कर अधिकारी कंपनियों को घाटे को आगे ले जाने के लाभ से इनकार कर रहे हैं, भले ही राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट (एनसीएलटी) ने उनकी योजनाओं को मंजूरी दी हो। विवेक जालान (टैक्स कनेक्ट एडवाइजरी के पार्टनर) के अनुसार, आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 79 के तहत कंपनियों को तब तक घाटे को आगे ले जाने की अनुमति नहीं है जब तक कि उनकी 51 प्रतिशत से अधिक शेयरधारिता में बदलाव न हो। दीवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत अधिग्रहण प्रक्रिया में स्वामित्व में बदलाव के लिए एक अपवाद है, लेकिन इसके साथ एक शर्त जुड़ी हुई है। कर अधिकारियों को सूचित किए बिना समाधान योजना को मंजूरी देने पर कंपनियों को घाटे का लाभ खोने का जोखिम होता है। पराग राठी (राठी ऐंड कंपनी के पार्टनर) ने बताया कि यह असंगति कानूनी डिजाइन में अंतर के कारण उत्पन्न हुई है, जहां कर कानून में अधिकारियों को सुनने की आवश्यकता है, लेकिन दीवाला ढांचे में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
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यह स्थिति कंपनियों के लिए वित्तीय अनिश्चितता का कारण बन रही है, जिससे उनके भविष्य की कर देनदारी प्रभावित हो सकती है।
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