आईबीसी प्रणाली में देरी से बैंक परेशान, समाधान प्रक्रिया की चुनौतियाँ बढ़ी
10 साल बाद भी IBC सिस्टम पर सवाल, बढ़ती देरी से परेशान बैंक
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भारत में दीवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के लागू होने के 10 साल बाद, बैंक समाधान प्रक्रिया में बढ़ती देरी से चिंतित हैं। उच्चतम न्यायालय के अनुसार, कई मामले वर्षों से मंजूरी की प्रतीक्षा में हैं, जिससे संपत्ति के मूल्य में कमी और वसूली में गिरावट आई है।
- 01आईबीसी के तहत 2016 से अब तक 3.45 लाख करोड़ रुपये के बकाया दावों के 7,102 मामले बंद हुए हैं।
- 02समाधान प्रक्रिया की समय सीमा 330 दिन से बढ़कर 744 दिन तक पहुंच गई है।
- 03एनसीएलटी में केवल 53 सदस्यों की नियुक्ति है, जबकि स्वीकृत पदों की संख्या 62 है।
- 04आईबीसी के तहत वसूली का प्रतिशत 32.8% से घटकर 30.56% हो गया है।
- 05आईबीसी में आने से पहले 32,179 कंपनियों का 14.61 लाख करोड़ रुपये का समाधान हुआ।
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भारत में दीवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) को 2016 में लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य फंसे कर्ज संकट का समाधान करना था। हालांकि, 10 वर्षों में, समाधान प्रक्रिया में देरी बढ़ गई है। मार्च 2026 तक, यह प्रक्रिया 744 दिनों तक पहुंच गई है, जबकि इसे 330 दिनों में पूरा करने का लक्ष्य था। उच्चतम न्यायालय ने बताया है कि 363 आवेदन मंजूरी की प्रतीक्षा में हैं, जिनमें से कुछ मामलों को चार साल से अधिक हो चुके हैं। इससे संपत्तियों के मूल्य में गिरावट आई है और वसूली में कमी आई है। आईबीबीआई के पूर्व प्रमुख एमएस साहू ने कहा कि कार्यवाही में देरी के कारण ऋणदाता हर साल हजारों करोड़ रुपये गंवा रहे हैं। एनसीएलटी की क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है, क्योंकि वर्तमान में केवल 53 सदस्य कार्यरत हैं। आईबीसी की सफलता केवल समाधान किए गए मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पहले भी कई मामले निपटाए गए हैं, जिनका कुल मूल्य 14.61 लाख करोड़ रुपये है।
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बैंकों को समय पर समाधान न होने के कारण हर साल हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।
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