बच्चों में ऑटिज्म के शुरुआती लक्षणों की पहचान पर विशेषज्ञों की सलाह
बच्चों में ऑटिज्म के शुरुआती लक्षण कैसे पहचानें? दिल्ली में देरी से पहचान ने बढ़ाई टेंशन
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Image: Jagran
विशेषज्ञों ने बच्चों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई है। दिल्ली में अधिकांश मामलों की पहचान देर से हो रही है, जबकि लक्षण पहले तीन वर्षों में ही दिखाई देने लगते हैं। समय पर पहचान और हस्तक्षेप से प्रभावित बच्चों के विकास में सुधार संभव है।
- 01ऑटिज्म के लक्षण पहले तीन वर्षों में दिखाई देते हैं।
- 02दिल्ली में पहचान की प्रक्रिया में देरी हो रही है।
- 03पहले हजार दिन बच्चे के मस्तिष्क विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- 04देर से पहचान से बच्चे के विकास में बाधा आती है।
- 05समय पर हस्तक्षेप से बच्चों के व्यवहार और सामाजिक कौशल में सुधार संभव है।
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विशेषज्ञों ने बच्चों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की बाल रोग विभाग की डॉ. शेफाली गुलाटी ने बताया कि ऑटिज्म के लक्षण जन्म के बाद पहले तीन वर्षों में ही दिखाई देने लगते हैं, लेकिन दिल्ली में अधिकांश मामलों में पहचान देर से हो रही है। उन्होंने कहा कि माता-पिता को लक्षणों को गंभीरता से लेना चाहिए और समय पर हस्तक्षेप करना आवश्यक है। डॉ. शेफाली ने बताया कि बच्चे के जीवन के पहले हजार दिन मस्तिष्क विकास के लिए सबसे संवेदनशील होते हैं। यदि इस दौरान ऑटिज्म की पहचान हो जाए, तो बच्चे के व्यवहार, भाषा और सामाजिक कौशल में सुधार संभव है। विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चे आमतौर पर दो से चार साल की उम्र के बाद ही विशेषज्ञों तक पहुंचते हैं, जिससे समय की बर्बादी होती है। ऑटिज्म के शुरुआती संकेत जैसे नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया न देना, आंखों में संपर्क की कमी, और अन्य बच्चों के साथ खेलने में रुचि न लेना, पहले वर्ष में ही दिखाई दे सकते हैं।
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समय पर ऑटिज्म की पहचान से प्रभावित बच्चों को बेहतर जीवन की दिशा में आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है।
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