पश्चिम एशिया संकट से भारतीय दवा उद्योग की छोटी कंपनियों पर आर्थिक दबाव
पश्चिम एशिया संकट से छोटी-मझोली दवा कंपनियों के मुनाफे पर दबाव, लागत और सप्लाई बाधाओं से बढ़ी चिंता

Image: Business Standard
पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण भारतीय दवा उद्योग, विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। लागत में वृद्धि और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं के चलते लाभप्रदता में 3 से 5 फीसदी की कमी आने की संभावना है।
- 01पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण भारतीय दवा कंपनियों की कार्यशील पूंजी पर 12 से 15 फीसदी का प्रभाव पड़ सकता है।
- 02छोटी कंपनियों के लिए निवेश पर रिटर्न 5 से 5.5 फीसदी तक घट सकता है।
- 03एपीआई और अन्य कच्चे माल की कीमतों में 200 फीसदी तक की वृद्धि हुई है।
- 04दवा उद्योग को प्रति माह लगभग 15,000 टन मेथनॉल और 12,000 टन अमोनिया की आवश्यकता है।
- 05बड़ी कंपनियों के पास 2-3 महीने का स्टॉक है, जबकि छोटी कंपनियां केवल 3-6 सप्ताह के स्टॉक के साथ काम करती हैं।
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पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण भारतीय दवा उद्योग, विशेषकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को गंभीर आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। उद्योग विश्लेषण के अनुसार, कार्यशील पूंजी पर 12 से 15 फीसदी का प्रभाव पड़ सकता है, जिससे निवेश पर रिटर्न 5 से 5.5 फीसदी तक घट सकता है। इस संकट के चलते एपीआई, सॉल्वेंट और अन्य कच्चे माल की कीमतों में 200 फीसदी तक की वृद्धि हो गई है। इसके अलावा, दवा उद्योग को प्रति माह 15,000 टन मेथनॉल और 12,000 टन अमोनिया की आवश्यकता है। बड़ी कंपनियों के पास आपूर्ति श्रृंखला में 2-3 महीने का स्टॉक है, जबकि छोटी कंपनियों के पास केवल 3-6 सप्ताह का स्टॉक होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि तत्काल दवा की कमी नहीं है, लेकिन छोटे दवा निर्माताओं के लिए स्थिर मूल्य निर्धारण और निर्बाध आपूर्ति बनाए रखना कठिन हो रहा है।
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छोटी दवा कंपनियों को उच्च लागत और आपूर्ति बाधाओं के कारण आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
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