भोजशाला आंदोलन: मालवा में धार्मिक मुक्ति की बड़ी लहर
भोजशाला आंदोलन बना मालवा का बड़ा जनआंदोलन, गांव-गांव तक पहुंची मुक्ति की मुहिम
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भोजशाला को हिंदुओं को सौंपने की मांग को लेकर मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में एक बड़ा जनआंदोलन चल रहा है। यह आंदोलन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, और अन्य संगठनों द्वारा गांव-गांव तक फैलाया गया है, जिसमें लाखों लोगों ने भाग लिया। 2003 में सरकार ने भोजशाला में पूजा की अनुमति दी, जो 698 वर्षों बाद मिली।
- 01भोजशाला मुक्ति आंदोलन 1994 में शुरू हुआ, जब धार के संघ कार्यकर्ताओं ने वहां धार्मिक अनुष्ठान शुरू किए।
- 021997 में कांग्रेस सरकार के निर्णय ने आंदोलन को और तेज किया, जिसमें हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया था।
- 032000 में हिंदू जागरण मंच ने 1,334 धर्मरक्षा समितियों का गठन किया, जिससे आंदोलन को व्यापक समर्थन मिला।
- 04सात फरवरी, 2000 को मातृशक्ति संगम में 10,000 महिलाओं ने भोजशाला मुक्ति का संकल्प लिया।
- 05आंदोलन के दौरान प्रशासन ने धारा 144 लागू की, जिसमें 39 धर्मरक्षक घायल हुए और दो की मौत हुई।
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भोजशाला को हिंदुओं को सौंपने की मांग को लेकर मध्य प्रदेश के मालवा अंचल में एक बड़ा जनआंदोलन चल रहा है। यह आंदोलन 1994 में शुरू हुआ, जब धार के संघ कार्यकर्ताओं ने भोजशाला परिसर में धार्मिक अनुष्ठान करना प्रारंभ किया। 1997 में कांग्रेस सरकार द्वारा हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने के निर्णय ने आंदोलन को और तेज किया। इसके बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, और बजरंग दल जैसे संगठनों ने इसे गांव-गांव तक फैलाया। 2000 में हिंदू जागरण मंच ने 1,334 धर्मरक्षा समितियों का गठन किया, जिससे आंदोलन को व्यापक समर्थन मिला। 2000 में मातृशक्ति संगम में एक लाख से अधिक धर्मरक्षकों ने भोजशाला मुक्ति का संकल्प लिया। इस दौरान प्रशासन ने धारा 144 लागू की, जिसमें कई लोग घायल हुए और दो की मौत हुई। अंततः, 8 अप्रैल 2003 को सरकार ने भोजशाला में प्रतिदिन दर्शन और पूजा की अनुमति दी, जो 698 वर्षों बाद मिली। इस निर्णय के बाद पूरे जिले में विजय उत्सव और महाआरती का आयोजन किया गया।
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भोजशाला आंदोलन ने स्थानीय हिंदू समुदाय में धार्मिक पहचान को मजबूत किया है और इसने समाज में एकजुटता को बढ़ावा दिया है।
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