बैंकिंग नियमों की कठोरता: वेंटिलेटर पर मरीज के पैसे फंसे
वेंटिलेटर पर सांसें और बैंक में पैसा दोनों अटकीं, क्या आम आदमी के लिए फांस बन गए बैंकिंग नियम?
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एक व्यक्ति के मामाजी, जो वेंटिलेटर पर हैं, की सारी जमापूंजी सरकारी बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट में जमा है। जब परिवार को पैसे की जरूरत पड़ी, तो बैंक ने री-केवाईसी न होने के कारण खाता सील कर दिया। यह मामला बैंकिंग नियमों की कठोरता और मानवीय दृष्टिकोण की कमी को उजागर करता है।
- 01बैंक ने मरीज के री-केवाईसी न होने के कारण खाता सील किया।
- 02आरबीआई के नियमों के अनुसार गंभीर रूप से बीमार लोगों के लिए बैंक को ढील देनी चाहिए।
- 03यह समस्या सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि लाखों बुजुर्गों और बीमार लोगों की है।
- 04बैंकिंग प्रणाली में तकनीक के साथ-साथ मानवता और समझ की जरूरत है।
- 05सोशल मीडिया पर इस मामले ने व्यापक ध्यान आकर्षित किया है।
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एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर बताया कि उनके मामाजी, जो वेंटिलेटर पर हैं, की सारी जमापूंजी सरकारी बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में जमा है। जब परिवार को इलाज के लिए पैसे की आवश्यकता पड़ी, तो उन्हें पता चला कि बैंक ने खाता सील कर दिया है। बैंक का कहना है कि मरीज ने री-केवाईसी (Re-KYC) नहीं कराया है, इसलिए खाता नहीं खोला जा सकता। मरीज के परिजन बैंक से मानवीय आधार पर मदद की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन बैंक ने स्पष्ट किया कि यदि मरीज स्वयं बैंक नहीं आ सकता, तो खाता नहीं खोला जाएगा। यह स्थिति गंभीर और चिंताजनक है, क्योंकि एक ओर हम डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर मरीजों से बैंक आने की शर्त रखना कठोरता का प्रतीक है। आरबीआई के नियमों के अनुसार गंभीर रूप से बीमार लोगों के लिए बैंक को ढील देनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। यह समस्या केवल एक परिवार की नहीं है, बल्कि देश के लाखों बुजुर्गों और बीमार लोगों की है, जो इस तरह की स्थिति का सामना कर रहे हैं।
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इस मामले से यह स्पष्ट होता है कि बैंकिंग प्रणाली में मानवीय दृष्टिकोण की कमी है, जो गंभीर रूप से बीमार लोगों के लिए समस्याएँ पैदा कर सकती है।
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