सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: पत्नी की करियर महत्वाकांक्षा को 'क्रूरता' नहीं माना जा सकता
पत्नी की करियर महत्वाकांक्षा 'क्रूरता' या जिम्मेदारी से भागना नहीं, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
Aaj Tak
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भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि एक महिला का अपने करियर को आगे बढ़ाना और बच्चे के लिए स्थिरता सुनिश्चित करना 'क्रूरता' नहीं है। यह फैसला एक लेफ्टिनेंट कर्नल और उनकी डेंटिस्ट पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद से संबंधित है, जिसमें महिला के करियर को 'रेग्रेसिव' मानने वाले निचली अदालतों के निर्णयों को खारिज किया गया है।
- 01महिला का करियर आगे बढ़ाना अब 'क्रूरता' नहीं माना जाएगा।
- 02सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के निर्णयों को खारिज किया।
- 03पति की 'मौन वीटो' के अधीन नहीं होगी पत्नी की पेशेवर पहचान।
- 04महिला की व्यक्तिगत पहचान शादी के बाद खत्म नहीं होती।
- 05सुप्रीम कोर्ट ने पति की झूठी गवाही की याचिका खारिज की।
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भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि एक योग्य महिला का अपने पेशेवर करियर को आगे बढ़ाना और अपने बच्चे के लिए स्थिरता सुनिश्चित करना 'क्रूरता' या तलाक का आधार नहीं हो सकता। यह फैसला एक लेफ्टिनेंट कर्नल और उनकी डेंटिस्ट पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद से संबंधित है। कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट और फैमिली कोर्ट के उन निष्कर्षों को खारिज किया, जिन्होंने महिला के करियर को 'रेग्रेसिव' माना था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता ने स्पष्ट किया कि पत्नी की पेशेवर पहचान पति के 'मौन वीटो' के अधीन नहीं है। कोर्ट ने कहा कि शादी किसी महिला की व्यक्तिगत पहचान को खत्म नहीं करती है और उसे केवल वैवाहिक दायित्वों में सीमित नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, कोर्ट ने पति की उस याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें उसने पत्नी पर झूठी गवाही का मुकदमा चलाने की मांग की थी। अदालत ने निचली अदालतों द्वारा महिला के चरित्र पर की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को भी अस्वीकार कर दिया।
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यह फैसला महिलाओं को अपने करियर को आगे बढ़ाने और व्यक्तिगत पहचान बनाए रखने का अधिकार देता है, जो समाज में महिलाओं की स्थिति को मजबूत करेगा।
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