नालंदा के गांवों में फौजियों की परंपरा और राष्ट्रभक्ति का जज्बा
Bihar Soldiers: नालंदा में फौजियों का गांव, यहां के नौजवानों की नसों में ही देश सेवा का नशा
Nbt NavbharattimesImage: Nbt Navbharattimes
नालंदा जिले के सकरौढ़ा और मोकरमपुर गांवों में देशभक्ति की एक अनूठी परंपरा विकसित हुई है, जहां हर बच्चा सेना की वर्दी और तिरंगे के सपनों के साथ बड़ा होता है। यहां के युवा रिटायर्ड सैनिकों के मार्गदर्शन में सैन्य प्रशिक्षण लेते हैं, जिससे हर साल कई युवा सरकारी सुरक्षा सेवाओं में चयनित होते हैं।
- 01सकरौढ़ा और मोकरमपुर गांवों में देशभक्ति की गहरी परंपरा है।
- 02इन गांवों में हर घर में सेना का कोई न कोई सदस्य है।
- 03रिटायर्ड सैनिक युवाओं को सैन्य प्रशिक्षण देते हैं।
- 04नशा मुक्ति और अनुशासन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
- 05गांवों में हर साल औसतन दो से छह युवा सरकारी सेवाओं में चयनित होते हैं।
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नालंदा जिले के सकरौढ़ा और मोकरमपुर गांवों में देशभक्ति और सैन्य सेवा की एक अद्भुत परंपरा विकसित हुई है। यहां के बच्चे तिरंगे और वर्दी के सपनों के साथ बड़े होते हैं। मोकरमपुर में 65 घरों में से 35 घरों के सदस्य सेना में हैं, जबकि सकरौढ़ा में 600 घरों में से 100 से अधिक परिवारों के बेटे विभिन्न सुरक्षा बलों का हिस्सा हैं। यह परंपरा 1961 से शुरू हुई, जब कैप्टन कौशल किशोर प्रसाद ने गांव में देश सेवा की अलख जगाई। यहां की 'दस्तूर फील्ड' पर रिटायर्ड सैनिक युवाओं को प्रशिक्षण देते हैं, जिससे वे न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी मजबूत बनते हैं। युवाओं को नशा न करने और अनुशासन का पालन करने की शपथ लेनी होती है। 2017 के बाद से, हर साल औसतन दो से छह युवा सरकारी सुरक्षा सेवाओं में चयनित होकर गांव का मान बढ़ा रहे हैं। यह कहानी न केवल रोजगार पाने की है, बल्कि 'राष्ट्र सर्वोपरि' के नारे को जीवित रखने की भी है।
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यह परंपरा युवाओं को रोजगार के नए अवसर प्रदान करती है और उन्हें देश सेवा के लिए प्रेरित करती है।
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