सुप्रीम कोर्ट ने अंतरधार्मिक विवाह पर पारसी महिलाओं के धार्मिक बहिष्कार को भेदभावपूर्ण बताया
'अंतरधार्मिक विवाह पारसी महिलाओं को समाज से बाहर निकालने का आधार नहीं', सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
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भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अंतरधार्मिक विवाह करने वाली पारसी महिलाओं के खिलाफ धार्मिक बहिष्कार को भेदभावपूर्ण करार दिया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में संविधान पीठ ने कहा कि विवाह के आधार पर किसी के धार्मिक अधिकारों को नहीं छीना जा सकता।
- 01सुप्रीम कोर्ट ने पारसी महिलाओं के धार्मिक बहिष्कार को भेदभावपूर्ण बताया।
- 02अनुच्छेद 25(1) के तहत अंत:करण का अधिकार जन्मजात है।
- 03विवाह के आधार पर किसी के धार्मिक अधिकारों को नहीं छीना जा सकता।
- 04पारसी महिला के वकील ने कहा कि अंतरधार्मिक विवाह अपराध नहीं है।
- 05जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यह भेदभाव केवल महिलाओं पर लागू नहीं होना चाहिए।
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भारत के सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि अंतरधार्मिक विवाह करने पर पारसी महिलाओं का धार्मिक बहिष्कार भेदभावपूर्ण है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद-25(1) के तहत अंत:करण का अधिकार जन्मजात होता है और इसे विवाह के आधार पर नहीं छीना जा सकता। सुनवाई के दौरान, एक पारसी महिला के वकील डेरियस खंबाटा ने कहा कि अंतरधार्मिक विवाह एक अपराध नहीं है और इसे प्रगतिशील धर्म पर थोपे गए प्रतिबंध के रूप में देखा जाना चाहिए। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यह भेदभाव केवल महिलाओं पर लागू नहीं होना चाहिए और पारसी धर्म का लाभ जन्म के आधार पर सभी सदस्यों को मिलना चाहिए।
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यह निर्णय पारसी समुदाय में महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करेगा और अंतरधार्मिक विवाह को स्वीकार्यता प्रदान करेगा।
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