राजकोषीय घाटा 5% तक पहुंचने की आशंका, बजट पर पड़ सकता है गंभीर प्रभाव
Editorial: राजकोषीय घाटा 5% तक पहुंचने की आशंका, पटरी से उतर सकता है देश का बजट
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Context
राजकोषीय घाटा वह अंतर है जो सरकार की कुल खर्च और आय के बीच होता है। यदि यह घाटा बहुत अधिक हो जाता है, तो यह आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है।
What The Author Says
लेखक का तर्क है कि राजकोषीय घाटा 5% तक पहुंच सकता है, जिससे बजट पर गंभीर दबाव पड़ेगा। सरकार को तत्काल समायोजन की आवश्यकता है।
Key Arguments
📗 Facts
- कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण चालू खाते का घाटा बढ़ रहा है।
- सरकार का राजकोषीय घाटा जीडीपी के 4.3% तक सीमित करने का लक्ष्य था।
- तेल कंपनियों को प्रति माह लगभग 30,000 करोड़ रुपये की अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ रहा है।
📕 Opinions
- अर्थशास्त्रियों का मानना है कि चालू वित्त वर्ष में सीएडी जीडीपी के 2% से अधिक हो सकता है।
- सरकार को अपनी विनिवेश योजनाओं को न छोड़ने की आवश्यकता है।
Counterpoints
राजकोषीय घाटा हमेशा आर्थिक संकट का संकेत नहीं होता।
कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि उच्च घाटा विकास के लिए जरूरी निवेश को दर्शा सकता है।
सरकार के पास राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के अन्य उपाय हैं।
सरकार खर्च में कटौती के बजाय कर सुधारों के माध्यम से भी घाटे को कम कर सकती है।
बाजार में घरेलू प्रवाह मजबूत है।
घरेलू निवेशकों की मजबूत उपस्थिति बाजार को सहारा दे सकती है, जिससे राजकोषीय घाटा कम हो सकता है।
Bias Assessment
लेखक सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहा है, लेकिन संभावित सुधारों पर भी विचार नहीं कर रहा।
Why This Matters
वर्तमान में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी मुद्रा की कमी के कारण राजकोषीय घाटा बढ़ने की संभावना है। यह स्थिति सरकार की आर्थिक नीतियों पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।
🤔 Think About
- •क्या सरकार के पास घाटे को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं?
- •क्या उच्च राजकोषीय घाटा विकास को प्रभावित कर सकता है?
- •क्या घरेलू निवेशक बाजार को स्थिर रखने में मदद कर सकते हैं?
- •क्या सरकार को अपनी विनिवेश योजनाओं को बढ़ाना चाहिए?
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