भारतीय नाविकों का ईरान युद्ध के बीच समुद्र में काम करने का जोखिम
ईरान युद्ध के बावजूद समुद्र में काम करने का जोखिम क्यों उठा रहे हैं भारतीय नाविक?

Image: Jagran
भारतीय नाविक, जैसे सुनील पूनिया, ईरान युद्ध के दौरान समुद्र में काम करने का जोखिम उठा रहे हैं। मर्चेंट नेवी में काम करने वाले भारतीयों की संख्या 320,000 है, लेकिन हाल के हमलों में कई भारतीय नाविकों की जान गई है। आर्थिक मजबूरियों के चलते युवा इस जोखिम को स्वीकार कर रहे हैं।
- 01ईरान युद्ध के कारण मर्चेंट नेवी के हताहत होने वाले नाविकों में सबसे बड़ी संख्या भारतीयों की है।
- 02भारत में मर्चेंट नेवी में लगभग 320,000 नाविक सक्रिय हैं, जिनमें से कई युद्ध क्षेत्रों में काम कर रहे हैं।
- 03हाल ही में हुए हमलों में 11 मर्चेंट नाविकों की मौत हुई है, जिनमें से चार भारतीय हैं।
- 04नाविकों के लिए आर्थिक मजबूरियां, जैसे बेरोजगारी, उन्हें जोखिम उठाने के लिए प्रेरित कर रही हैं।
- 05राजस्थान के दलीप सिंह और आशीष कुमार सिंह जैसे नाविकों ने अपने परिवारों के लिए बेहतर जीवन की तलाश में समुद्र में काम करने का निर्णय लिया।
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ईरान युद्ध के बीच भारतीय नाविकों के लिए समुद्र में काम करना जोखिम भरा बन गया है। सुनील पूनिया जैसे नाविकों ने हाल ही में एक हमले का सामना किया, जिसमें उनके दो साथी मारे गए। भारत मर्चेंट शिपिंग में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक है, जहां लगभग 320,000 भारतीय नाविक सक्रिय हैं। हाल के हमलों में अब तक 11 मर्चेंट नाविकों की मौत हुई है, जिनमें चार भारतीय शामिल हैं। मर्चेंट नेवी में काम करने वाले कई युवा, जैसे दलीप सिंह, आर्थिक मजबूरियों के कारण इस जोखिम को स्वीकार कर रहे हैं। दलीप ने मर्चेंट नेवी में नौकरी पाने के लिए कर्ज लिया था, लेकिन उनकी मौत ने उनके परिवार को बर्बाद कर दिया। ऐसे में, कई नाविक समुद्र में काम करने के लिए मजबूर हैं, क्योंकि यह उन्हें बेहतर आय और सामाजिक सम्मान प्रदान करता है।
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भारतीय नाविकों की जान जाने से उनके परिवारों पर आर्थिक और भावनात्मक प्रभाव पड़ा है।
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