धान की खेती से बढ़ता ग्लोबल वार्मिंग का खतरा: नई रिसर्च में खुलासा
धान की खेती से बढ़ रहा ग्लोबल वार्मिंग का खतरा, रिसर्च में दावा- गर्म हो रही धरती

Image: Jagran
एक नए अध्ययन के अनुसार, धान की खेती से होने वाला ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन पिछले 65 वर्षों में दोगुना हो चुका है, जो अब सालाना 1.1 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर है। एशिया में चावल उत्पादन का इस उत्सर्जन में सबसे बड़ा योगदान है।
- 01धान की खेती से सालाना 1.1 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है।
- 022001 से 2020 के बीच एशिया का ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 90 प्रतिशत से अधिक योगदान रहा।
- 03पूर्वी एशिया में मीथेन उत्सर्जन सबसे अधिक है, जबकि अफ्रीका नया 'हॉटस्पॉट' बन रहा है।
- 04धान की खेती का क्षेत्र 2015 में 39.7 करोड़ एकड़ से बढ़कर 2024 तक 42.6 करोड़ एकड़ होने की संभावना है।
- 05उत्सर्जन को 10 प्रतिशत तक कम करने के लिए बेहतर कृषि प्रथाओं को अपनाने की आवश्यकता है।
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एक नए अध्ययन में बताया गया है कि धान की खेती से होने वाला ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन पिछले 65 वर्षों में दोगुना होकर सालाना 1.1 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर पहुंच गया है। यह अध्ययन बोस्टन कॉलेज के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है और 'नेचर फूड' जर्नल में प्रकाशित हुआ है। 2001 से 2020 के बीच एशिया ने चावल उत्पादन में सबसे बड़ा योगदान दिया, जिसमें 90 प्रतिशत से अधिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का हिस्सा रहा। अध्ययन में यह भी पाया गया कि पूर्वी एशिया में मीथेन का उत्सर्जन सबसे अधिक है, जबकि अफ्रीका तेजी से धान की खेती का नया 'हॉटस्पॉट' बन रहा है। शोधकर्ताओं का मानना है कि बेहतर कृषि प्रथाओं के माध्यम से, जैसे कि पानी का प्रबंधन और उर्वरकों का प्रभावी उपयोग, धान की खेती से उत्सर्जन में लगभग 10 प्रतिशत की कमी लाई जा सकती है।
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धान की खेती से बढ़ता ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन को बढ़ा रहा है, जिससे वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है।
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