ट्रंप का दबाव: अरब और पाकिस्तान क्यों नहीं मानते इज़रायल को?
Explainer: क्यों ट्रंप चाहते हैं कि अरब और पाकिस्तान दें इजरायल को मान्यता, इन देशों के लिए क्यों मुश्किल

Image: News 18 Hindi
मध्य पूर्व में इज़रायल को मान्यता देने में अरब देशों और पाकिस्तान की अनिच्छा के पीछे धार्मिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक कारण हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन देशों से इज़रायल को स्वीकार करने का आग्रह किया है, यह मानते हुए कि इससे क्षेत्रीय स्थिरता बढ़ेगी।
- 01इज़रायल की स्थापना 1948 में हुई, जिसके बाद अरब देशों ने इसका विरोध किया।
- 02अरब देशों की मुख्य आपत्ति फ़िलिस्तीनी मुद्दे और यरुशलम के धार्मिक महत्व से जुड़ी है।
- 03पाकिस्तान की नीति है कि जब तक स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी देश नहीं बनता, तब तक इज़रायल को मान्यता नहीं दी जाएगी।
- 04ट्रंप का मानना है कि अरब-इज़रायल संबंध सामान्य होने से क्षेत्र में स्थिरता आएगी।
- 05सऊदी अरब की इज़रायल को मान्यता देने की संभावना फ़िलिस्तीनी मुद्दे पर प्रगति पर निर्भर है।
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मध्य पूर्व में इज़रायल को मान्यता देने का मुद्दा दशकों से विवादित रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अरब देशों और पाकिस्तान से इज़रायल को स्वीकार करने का आग्रह किया है, यह मानते हुए कि इससे क्षेत्रीय स्थिरता बढ़ेगी। अरब देशों की मुख्य आपत्ति फ़िलिस्तीनी मुद्दे और यरुशलम के धार्मिक महत्व से जुड़ी है। इज़रायल की स्थापना 1948 में हुई, जिसके बाद अरब देशों ने इसका विरोध किया, यह मानते हुए कि इज़रायल ने फ़िलिस्तीनियों की भूमि पर कब्जा किया है। पाकिस्तान की स्थिति अलग है; उसकी नीति है कि जब तक स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी देश नहीं बनता, तब तक इज़रायल को मान्यता नहीं दी जाएगी। ट्रंप का तर्क है कि अरब देशों को इज़रायल के साथ व्यापार और तकनीकी सहयोग से लाभ होगा। सऊदी अरब की इज़रायल को मान्यता देने की संभावना फ़िलिस्तीनी मुद्दे पर प्रगति पर निर्भर करती है।
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इज़रायल को मान्यता देने से अरब देशों और पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति पर प्रभाव पड़ेगा।
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