वैज्ञानिकों ने 3D प्रिंटेड अंडों से निकाले चूजे, डायनासोर युग की वापसी की उम्मीद
फिर से लौट सकता है 'डायनासोर युग'! वैज्ञानिकों ने पाई बड़ी सफलता, 3D अंडों से निकाले चूजे

Image: News 18 Hindi
अमेरिका की बायोटेक कंपनी कोलोसल बायोसाइंसेज ने 3D प्रिंटेड कृत्रिम अंडों से 26 स्वस्थ चूजे निकाले हैं। यह प्रयोग विलुप्त प्रजातियों को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, खासकर न्यूजीलैंड के विशाल पक्षी 'साउथ आइलैंड जायंट मोआ' के लिए। हालांकि, विशेषज्ञों में इसके नैतिक और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर मतभेद हैं।
- 01कोलोसल बायोसाइंसेज ने 3D प्रिंटेड अंडों से 26 स्वस्थ चूजे निकाले हैं, जो डी-एक्सटिंक्शन की दिशा में एक बड़ा कदम है।
- 02साउथ आइलैंड जायंट मोआ, जो 600 साल पहले विलुप्त हुआ, का अंडा रग्बी बॉल के आकार का था, जिसे सामान्य तरीके से इनक्यूबेट नहीं किया जा सकता था।
- 03कंपनी का दावा है कि आर्टिफिशियल एग सिस्टम ऑक्सीजन सप्लाई के बिना भी कार्य करता है, जिससे बड़े अंडों को इनक्यूबेट करने में मदद मिलती है।
- 04कुछ वैज्ञानिक इसे संरक्षण के लिए उपयोगी मानते हैं, जबकि अन्य इसे नैतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से खतरनाक मानते हैं।
- 05भारतीय वैज्ञानिकों ने कहा है कि यह तकनीक भारत में लुप्तप्राय पक्षियों को बचाने में मदद कर सकती है।
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अमेरिका की बायोटेक कंपनी कोलोसल बायोसाइंसेज ने 3D प्रिंटेड कृत्रिम अंडों से 26 स्वस्थ चूजे निकाले हैं, जो विलुप्त प्रजातियों को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। कंपनी का लक्ष्य साउथ आइलैंड जायंट मोआ को फिर से जीवित करना है, जो डायनासोर युग के बाद का सबसे बड़ा उड़ान रहित पक्षी था। मोआ के अंडे सामान्य चिकन अंडे से 80 गुना बड़े थे, और इन्हें सामान्य तरीके से इनक्यूबेट नहीं किया जा सकता था। नई तकनीक में लैटिस संरचना वाले अंडे का उपयोग किया गया है, जो प्राकृतिक अंडों की तरह ऑक्सीजन का आदान-प्रदान करते हैं। हालांकि, वैज्ञानिकों में इस तकनीक के नैतिक और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर मतभेद हैं। कुछ इसे संरक्षण के लिए उपयोगी मानते हैं, जबकि अन्य इसे इकोसिस्टम पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाला मानते हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने भी इस तकनीक की संभावनाओं पर चर्चा की है, यह कहते हुए कि यह भारत में लुप्तप्राय पक्षियों जैसे साइबेरियन क्रेन को बचाने में मदद कर सकती है।
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यह तकनीक भारत में लुप्तप्राय पक्षियों को बचाने में मदद कर सकती है, जिससे जैव विविधता को बढ़ावा मिल सकता है।
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