डीलिस्टिंग से सरना आदिवासी समाज को होंगे लाभ: निशा उरांव
सरना आदिवासी ही बनेंगे प्रधानः ईसाई पाहन से जमीन मिलेगी वापस, निशा उरांव ने गिनाए 'डीलिस्टिंग के लाभ'
Image: Nbt Navbharattimes
निशा उरांव, एक भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी, ने डीलिस्टिंग की मांग का समर्थन किया, जिससे सरना आदिवासी समाज को लाभ होगा। डीलिस्टिंग से पारंपरिक पदों पर केवल मूल सरना धर्म के लोगों को रखा जाएगा, जिससे उनकी संस्कृति और अधिकार सुरक्षित रहेंगे।
- 01डीलिस्टिंग से सरना परंपरा और संस्कृति को मजबूती मिलेगी।
- 02पारंपरिक पदों पर धर्मांतरित आदिवासियों का कब्जा 30-40 प्रतिशत है।
- 03पेसा कानून के तहत मूल धर्म के आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन पर अधिकार मिलेगा।
- 04डीलिस्टिंग से ईसाई पाहन के कब्जे वाली जमीन गांव को वापस मिलेगी।
- 05आरक्षण का लाभ केवल सरना धर्म के लोगों को मिलेगा, जिससे युवाओं को नौकरी के अवसर मिलेंगे।
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रांची में भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) की अधिकारी निशा उरांव ने सरना आदिवासी समाज के लिए डीलिस्टिंग की मांग का समर्थन किया है। उनका कहना है कि डीलिस्टिंग से धर्मांतरित लोगों को अनुसूचित जनजाति सूची से बाहर करने से सरना परंपरा और संस्कृति को मजबूती मिलेगी। इससे ग्राम प्रधान, पाहन और महतो जैसे पारंपरिक पदों पर केवल मूल सरना धर्म के लोग ही आसीन हो सकेंगे। वर्तमान में, 30-40 प्रतिशत पारंपरिक पदों पर धर्मांतरित आदिवासियों का कब्जा है। उरांव ने बताया कि डीलिस्टिंग से आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन पर अधिकार मिलेगा, जिससे उनकी आय बढ़ेगी और रोजगार के अवसर पैदा होंगे। इसके अलावा, ईसाई पाहन के कब्जे में जो जमीन है, वह भी गांव को वापस मिलेगी। आरक्षण का लाभ केवल सरना धर्म के लोगों को मिलेगा, जिससे युवाओं को नौकरी के अवसर मिलेंगे।
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डीलिस्टिंग से सरना आदिवासी समाज को उनके अधिकारों की सुरक्षा मिलेगी, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होगा।
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