सुप्रीम कोर्ट से विलायती बबूल हटाने की मांग, आगरा में देसी पौधों की रोपाई की जरूरत
UP: विलायती बबूल से खतरे में सूर सरोवर, देसी पौधे लगाने की मांग; सुप्रीम कोर्ट से लगाई गुहार

Image: Amar Ujala
डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, जिसमें आगरा के सूर सरोवर से विलायती बबूल हटाने और उसकी जगह देसी पौधे लगाने की मांग की गई है। यह विदेशी प्रजाति जल संकट और जैव विविधता के नुकसान का कारण बन रही है।
- 01विलायती बबूल की जड़ें भूजल को सोख लेती हैं, जिससे जल संकट पैदा होता है।
- 02सरकारी योजनाओं में विलायती बबूल को पर्यावरण के लिए खतरा माना गया है।
- 03मथुरा में विलायती बबूल हटाने की अनुमति दी गई है, लेकिन आगरा में ऐसा क्यों नहीं हो रहा है।
- 04याचिकाकर्ता ने समानता का हवाला देते हुए आगरा में भी देसी पौधों की रोपाई की मांग की।
- 05वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत सुधारात्मक कदम उठाने का अधिकार मुख्य वन्यजीव वार्डन को है।
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डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने याचिका में कहा है कि विलायती बबूल, जो मैक्सिको और मध्य अमेरिका की विदेशी प्रजाति है, भूजल को सोख लेती है और स्थानीय पेड़-पौधों के लिए खतरा बनती है। इसके कारण प्रवासी पक्षियों का आवास भी खत्म हो रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार के साइट मैनेजमेंट प्लान (2020-2030) में इस प्रजाति को हटाने की सिफारिश की गई है। याचिका में उल्लेख किया गया है कि 12 दिसंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने मथुरा के वनों से विलायती बबूल हटाने की अनुमति दी थी, लेकिन आगरा के सूर सरोवर में ऐसा भेदभाव क्यों किया जा रहा है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि अगर मथुरा में यह संभव है, तो आगरा में भी देसी पौधों की रोपाई की जानी चाहिए। चंबल प्रोजेक्ट के उप वन संरक्षक ने देसी प्रजातियों की रोपाई से इनकार किया है, जबकि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत ऐसे सुधारात्मक कदम उठाने का अधिकार है।
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अगर आगरा में भी विलायती बबूल हटाए जाते हैं और देसी पौधे लगाए जाते हैं, तो इससे स्थानीय पारिस्थितिकी और जल संकट में सुधार हो सकता है।
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