Explainer: क्यों बढ़ रहा है टाटा संस पर पब्लिक होने का दबाव? अंदरूनी कलह व RBI के नियमों का पूरा सच
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भारत का सबसे बड़ा और करीब 108 साल पुराना कारोबारी साम्राज्य 'टाटा ग्रुप' इस समय एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। TCS, टाटा मोटर्स और टाटा स्टील जैसी 31 दिग्गज कंपनियों को अपने छाते के नीचे संभालने वाली मूल कंपनी 'टाटा संस' पर शेयर बाजार में लिस्ट होने का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे को लेकर टाटा संस को कंट्रोल करने वाले चैरिटेबल ट्रस्ट्स के अंदर ही आपसी मतभेद और खींचतान शुरू हो गई है। अब तक टाटा संस एक अनलिस्टेड कंपनी रही है, यानी इसके शेयर आम लोग बाजार से नहीं खरीद सकते, लेकिन अब घर के भीतर और बाहर, दोनों तरफ से इसे पब्लिक लिमिटेड कंपनी बनाने की मांग उठ रही है। कैसा है टाटा ग्रुप का अनोखा ढांचा? नमक से लेकर स्टील तक बनाने वाले इस ग्रुप का ढांचा दुनिया के बाकी कॉर्पोरेट घरानों से काफी अलग और अनोखा है, जिसकी कमान टाटा संस के हाथ में है। टाटा संस में सबसे बड़ी हिस्सेदारी, यानी करीब 66 फीसदी हिस्सा 'टाटा ट्रस्ट्स' के पास है, जो कई तरह के परोपकारी और सामाजिक काम करता है। टाटा ट्रस्ट्स असल में 13 अलग-अलग संस्थाओं से मिलकर बना है, जिनमें से 7 संस्थाओं के पास सीधे टाटा संस के शेयर हैं। इन सभी संस्थाओं से चुने गए 6 ट्रस्टी मिलकर टाटा ट्रस्ट्स का बोर्ड चलाते हैं। इस समय टाटा परिवार के नोएल टाटा इस ट्रस्ट के चेयरमैन हैं और वह टाटा संस के बोर्ड में डायरेक्टर भी हैं। इसके अलावा, भारी कर्ज से जूझ रहे कंस्ट्रक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के दिग्गज शापूरजी पलोनजी (SP) ग्रुप के पास टाटा संस की 18.4 फीसदी की दूसरी सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। आखिर कौन-कौन चाहता है टाटा संस की लिस्टिंग? टाटा संस को शेयर बाजार में लाने के लिए इस समय तीन अलग-अलग मोर्चों से दबाव आ रहा है। सबसे पहली आवाज खुद ट्रस्ट के भीतर से उठी है, जहां टाटा ट्रस्ट्स के 6 में से कम से कम दो वरिष्ठ ट्रस्टियों वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने खुलकर इसका समर्थन किया है। मीडिया इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि टाटा ग्रुप जिस तरह से सेमीकंडक्टर जैसे नए और आधुनिक क्षेत्रों में कदम रख रहा है, उसके लिए बहुत बड़े फंड की जरूरत है और इतना पैसा सिर्फ अंदरूनी स्रोतों से नहीं जुटाया जा सकता, इसलिए बाजार से पूंजी उठाना जरूरी है। Also Read: टाटा ट्रस्ट्स में बढ़ी अंदरूनी तकरार! Noel Tata ने वी. श्रीनिवासन और विजय सिंह की पुनर्नियुक्ति रोकी दूसरा दबाव शापूरजी पलोनजी ग्रुप की तरफ से है जो लंबे समय से चाहता है कि टाटा संस लिस्ट हो जाए। मौजूदा नियमों के मुताबिक, वे अपने शेयर किसी को आसानी से ट्रांसफर या बेच नहीं सकते हैं, ऐसे में लिस्टिंग होने के बाद उनके लिए अपनी हिस्सेदारी बाजार में बेचकर कर्ज से बाहर निकलने का रास्ता आसान हो जाएगा। हालांकि, इस ग्रुप का कोई भी सदस्य टाटा ट्रस्ट्स के बोर्ड में शामिल नहीं है। इन दोनों के अलावा सबसे बड़ा और कानूनी दबाव रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की तरफ से आ रहा है। क्या हैं RBI के नियम और क्यों फंसा है पेंच? टाटा संस असल में एक 'कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी' के रूप में काम करती है क्योंकि यह अपने ग्रुप की बाकी कंपनियों में निवेश संभालती है और इसी वजह से यह सीधे RBI के नियमों के दायरे में आती है। रिजर्व बैंक के संशोधित नियमों के मुताबिक, जिस भी ऐसी कंपनी के पास 1 लाख करोड़ रुपये (करीब 10.45 अरब डॉलर) से ज्यादा की संपत्ति है या जिसकी पहुंच सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से पब्लिक फंड तक है, उसे शेयर बाजार में लिस्ट होना ही पड़ेगा। मार्च 2025 के आंकड़ों के अनुसार, टाटा संस की अकेले की संपत्ति 1.75 लाख करोड़ रुपये पहुंच चुकी है, जिसके चलते वह सीधे इस नियम के दायरे में आ गई है। हालांकि, RBI के पास यह विशेष अधिकार है कि वह चाहे तो किसी कंपनी को इससे छूट दे सकती है। टाटा संस ने इस नियम से छूट के लिए RBI के पास अर्जी भी दी है, जिस पर अभी विचार चल रहा है। इस बीच, लिस्टिंग से बचने के लिए टाटा संस ने अपने कर्ज को कम करने की कोशिश भी तेज कर दी है, लेकिन यह कोशिश काफी होगी या नहीं, इस पर सस्पेंस बना हुआ है। विरोध में खड़े हैं नोएल टाटा और ट्रस्ट के अंदरूनी मतभेद जहां एक तरफ लिस्टिंग के पक्ष में माहौल बन रहा है, वहीं टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा इसके खिलाफ हैं। हालांकि उन्होंने सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा है, लेकिन खबरों के मुताबिक पिछले साल उन्होंने और कुछ अन्य ट्रस्टियों ने मिलकर लिस्टिंग का विरोध किया था और टाटा संस के चेयरमैन को निर्देश दिया था कि वे इस मामले में RBI से बात करके बीच का रास्ता निकालें। मामला सिर्फ लिस्टिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि टाटा ट्रस्ट्स के अंदरूनी कामकाज को लेकर भी विवाद गहरा गया है। महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर ने टाटा ट्रस्ट्स की एक बेहद अहम बोर्ड बैठक पर रोक लगाने का आदेश दे दिया है, जो ट्रस्ट के गवर्नेंस को लेकर मिली शिकायतों और जांच के बाद आया है। हैरान करने वाली बात यह है कि शिकायत करने वालों में खुद ट्रस्ट के सीनियर ट्रस्टी वेणु श्रीनिवासन शामिल हैं। यह बैठक टाटा ट्रस्ट्स की दो सबसे बड़ी संस्थाओं 'सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट' और 'सर रतन टाटा ट्रस्ट' के बीच होने वाली थी, जिनके पास टाटा संस की 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी है। इस बैठक के मुख्य एजेंडे में RBI के नए नियमों और लिस्टिंग के असर पर चर्चा करने के साथ-साथ टाटा संस के बोर्ड में टाटा ट्रस्ट्स के प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाना, चेयरमैन की दोबारा नियुक्ति और टाटा संस के प्रदर्शन की समीक्षा करना शामिल था। ट्रस्ट के नियमों के मुताबिक कोई भी फैसला बहुमत के आधार पर होता है, जिसका मतलब यह है कि अगर 6 में से आधे से ज्यादा ट्रस्टी लिस्टिंग के पक्ष में वोट कर देते हैं, तो टाटा संस को अपनी मर्जी के खिलाफ जाकर भी शेयर बाजार में आने की प्रक्रिया शुरू करनी ही पड़ेगी। (रॉयटर्स के इनपुट के साथ)
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