भाजपा विधायक पांडेय के बेटे के जमीन विवाद में सुनवाई जारी, दूसरे पक्ष ने मांगा समय
Uk: भाजपा विधायक पांडेय के बेटे से जुड़े जमीन विवाद में फिर हुई सुनवाई, दूसरे पक्ष ने जवाब के लिए मांगा समय

Image: Amar Ujala
बाजपुर, उत्तराखंड में भाजपा विधायक अरविंद पांडेय के बेटे अतुल पांडेय से जुड़े जमीन विवाद की सुनवाई शुक्रवार को हुई। दूसरे पक्ष के अधिवक्ता ने समय मांगा है, जबकि अतुल पांडेय ने अधिकारियों को शामिल करने की मांग की है, आरोप लगाते हुए कि यह उनके परिवार की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास है।
- 01अतुल पांडेय पर आरोप है कि उन्होंने जनजाति समाज के व्यक्ति की भूमि कूटरचित साक्ष्यों के आधार पर अपने नाम दर्ज की और फिर बेची।
- 02गुरविंदर सिंह, जो भूमि के दूसरे पक्षकार हैं, ने अपनी अनुपस्थिति के कारण जवाब देने के लिए समय मांगा।
- 03मंडलायुक्त ने जनजाति के पक्ष में भूमि संबंधित आदेश दिया था, जिसे बाद में विधायक ने राजस्व अभिलेखों में दर्ज कराया।
- 04जांच कमेटी का गठन डीएम की ओर से एडीएम की अध्यक्षता में किया गया है।
- 05अतुल पांडेय ने आरोप लगाया है कि चुनाव नजदीक आने पर उनके परिवार की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है।
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बाजपुर, उत्तराखंड में भाजपा विधायक अरविंद पांडेय के बेटे अतुल पांडेय से जुड़े एक विवादित भूमि मामले की सुनवाई शुक्रवार को हुई। इस सुनवाई में अतुल पांडेय ने कमेटी के समक्ष पेश होकर अपनी बात रखी। दूसरे पक्ष के अधिवक्ता ने बताया कि गुरविंदर सिंह, जो इस मामले में एक महत्वपूर्ण पक्षकार हैं, श्री हेमकुंड साहिब गए हुए हैं और लौटने पर अपना पक्ष प्रस्तुत करेंगे। अतुल पांडेय पर आरोप है कि उन्होंने गांव सैमलपुरी निवासी जनजाति समाज के व्यक्ति की तीन एकड़ से अधिक भूमि को कूटरचित साक्ष्यों के आधार पर अपने नाम दर्ज कराया और बाद में इसे गुरविंदर सिंह को बेच दिया। मंडलायुक्त द्वारा जनजाति के पक्ष में आदेश दिए जाने के बाद विधायक ने इसे राजस्व अभिलेखों में दर्ज कराया, लेकिन बाद में इसे हटा दिया गया। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए डीएम ने एडीएम की अध्यक्षता में जांच कमेटी का गठन किया है। अतुल पांडेय ने अधिकारियों को शामिल करने की मांग की है, यह कहते हुए कि चुनाव नजदीक आने पर उनके परिवार की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
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इस विवाद का स्थानीय जनजाति समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे उनकी भूमि अधिकारों की सुरक्षा पर सवाल उठ सकते हैं।
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