लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब आठ महीने से भी कम समय बचा है. ऐसे में राज्य की दो राजनीतिक ताकत सुख्रियों में है. पहली बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और दूसरी कांग्रेस. खासकर 24 मई को बीएसपी की गहन समीक्षा बैठक में मायावती की ओर से एक बार भी अकेले चुनाव लड़ने की बात नहीं कहा जाना लोगों का ध्यान खींच रहा है. वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी ने कांग्रेस के दलित विभाग के जिलाध्यक्षों की बैठक में इस बात पर चिंता जताई कि 1990 के बाद किस तरह उनकी पार्टी की गलतियों की वजह से दलित वोटबैंक दूर होता चला गया. इन दोनों घटनाओं से पहले यूपी में राहुल गांधी की मौजूदगी के वक्त कांग्रेस के दो दलित नेताओं राजेंद्र पाल गौतम और तनुज पूनिया का मायावती के घर जाने पर पहले मिलने का वक्त नहीं मिलना और फिर बीएसपी की ओर से इसपर कोई बयान नहीं आना. इन तमाम राजनीतिक घटनाओं को जोड़कर देखने पर उत्तर प्रदेश में कुछ नये राजनीतिक प्रयोग की अटकलें लगाई जा रही हैं. गौर करने वाली बात यह है कि हमेशा से कांग्रेस पर आक्रामक रहने वाली मायावती की इस पार्टी पर काफी समय से चुप्पी और उसके बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की ओर से यह कहा जाना कि वह केवल जीतने की शर्त पर गठबंधन करते हैं. यूपी चुनाव से ठीक पहले ये ऐसे राजनीतिक संकेत हैं जो किसी को भी सोचने पर मजबूर कर सकते हैं. इन्हीं राजनीतिक घटनाओं के बीच यह भी चर्चा शुरू हो चुकी है कि कांग्रेस के सामने गठबंधन के लिए समाजवादी पार्टी बेहद विकल्प है या बहुजन समाज पार्टी. अखिलेश यादव से दोस्ती बनाए रखने में राहुल गांधी को क्या फायदा? अखिलेश यादव और राहुल गांधी की दोस्ती पुरानी है. 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में आखिरी समय में यूपी के दो लड़के का नारा देकर दोनों साथ आए थे. हालांकि बीजेपी और मोदी लहर में दुर्गति होने के बाद दोनों अलग हो गए. 2019 में सपा ने बसपा से गठबंधन कर लिया और कांग्रेस अकेले यूपी के रण में उतरी. हालत यह हुआ कि राहुल गांधी खुद अमेठी से चुनाव हार गए. 2022 में समाजवादी पार्टी से गठबंधन नहीं हो पाने पर कांग्रेस प्रियंका गांधी को आगे कर ‘बेटी हूं, लड़ सकती हूं’ के नारे के साथ अकेले उतरी. फिर से कांग्रेस की वही दुर्गति हुई. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के बैनर तले राहुल गांधी और अखिलेश यादव एक बार फिर से साथ आए और इस बार दोनों का करिश्मा चल गया. कांग्रेस ने अपने पुराने गढ़ अमेठी और रायबरेली के साथ छह सीटों पर जीती और समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतकर अब तक का सबसे शानदार प्रदर्शन किया. माना जाता है कि राहुल और अखिलेश यादव की जोड़ी की वजह से ही बीजेपी लोकसभा में 240 सीटों पर ठहर गई और नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू की वैशाखी पर सरकार बनाने को मजबूर हुए. अब सवाल यह है कि क्या यूपी चुनाव 2027 में भी अखिलेश और राहुल की जोड़ी चल पाएगी? इसका जवाब तलाशने में कई तरह की बातें सामने आती है. जैसे लोकसभा चुनाव में मैसेज ये था कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे, वहीं विधानसभा चुनाव में नैरेटिव ये बनेगा कि यादव बिरादरी से आने वाले अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनेंगे. जानकार इतिहास की घटनाओं को मानते हुए कहते हैं कि यादव बिरादरी से किसी को यूपी में सीएम बनाए जाने के मसले पर दलितों और ओबीसी का एक बड़ा वर्ग शायद ही इस जोड़ी पर भरोसा करे. मायावती और राहुल गांधी में गठबंधन से कांग्रेस को कितना फायदा? समजावादी पार्टी को छोड़कर अगर कांग्रेस बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन करती है तो इसके भी फायदे के मजबूत तर्क हैं. माना जा रहा है कि अगर मायावती और राहुल गांधी हाथ मिलाते हैं तो यह केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा. यह गठबंधन यूपी के साथ उत्तराखंड, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में भी दिख सकता है. हिमाचल प्रदेश में फिलहाल कांग्रेस सत्ता में है और उसे बचाए रखना बड़ी चुनौती है. वहीं कांग्रेस उत्तराखंड और पंजाब को जीतने का मंसूबा पाले हुए है. आइए चारो राज्यों के समीकरण को समझते हैं. उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगर बीएसपी और कांग्रेस साथ मिलकर लड़ती है तो राज्य में एक बार फिर से दलित+मुस्लिम+ब्राह्मण का सोशल इंजीनियरिंग बनाया जा सकता है. मायावती भले ही 2012 से सत्ता से बाहर हैं, लेकिन माना जाता है कि अगर वह आज भी मजबूती के साथ मैदान में उतरती हैं तो यूपी के अधिकतम दलित वोटों को एक झटके में अपने साथ ला सकती हैं. वहीं बीएसपी के सतीश चंद्र मिश्रा और राहुल गांधी के चहेरे पर ब्राह्मण वोटों को बीजेपी से झटका जा सकता है. रही बात मुस्लिम वोटों की तो इस समाज को अगर लगा कि यह गठबंधन बीजेपी को हराने में समाजवादी पार्टी से ज्यादा मजबूत दिख रहा है तो वह एक साथ इधर शिफ्ट हो सकती है. वैसे भी भारत के हरेक राज्य में मुस्लिम और दलित वोटर हमेशा से एक साथ आते रहे हैं. उत्तराखंड: पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में कांग्रेस का सीधा मुकाबला बीजेपी से होता है. लेकिन इस राज्य में भी बीएसपी ठीक ठाक मजबूत पार्टी है. राज्य में करीब 18 से 19 फीसदी दलित वोटबैंक हैं. ऐसे में अगर चुनाव में राहुल गांधी और मायावती के गठजोड़ में चुनाव होते हैं तो यह बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती साबित हो सकती है. 2022 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड में कांग्रेस ने 20 तो बीएसपी ने दो सीटों पर जीत दर्ज की थी. हिमाचल प्रदेश: इस समय हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है. लेकिन पिछले चार, साढ़े चार साल में वहां से जिस तरह की खबरें आई हैं उसे बीजेपी किस तरह से चुनाव में उठाएगी इस बात का अंदाजा सभी को है. सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू की अगुवाई में हिमाचल प्रदेश में डगमग-डगमग हालत में ही सरकार चलती रही है. ऐसे में कांग्रेस को अकेले दम पर यहां दोबारा सत्ता में लौटना आसान नहीं होगा. ऐसे में करीब 25 फीसदी दलित आबादी वाले राज्य में मायावती भी कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ती हैं तो इस समीकरण को ब्रेक करना बीजेपी के लिए कठिन हो सकता है. पंजाब: पूर्व सीएम कैप्टन अमर