MTP कानून पर अदालतों की सख्त निगरानी: डॉक्टरों और महिलाओं के अधिकारों पर उठे सवाल
अदालतों की सख्त निगरानी में MTP कानून, डॉक्टरों और महिलाओं के अधिकारों पर उठे सवाल
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मुंबई में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट को लेकर अदालतों और डॉक्टरों के बीच बहस बढ़ी है। विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा कानून महिलाओं की स्वायत्तता को प्राथमिकता नहीं देता, जिससे डॉक्टरों को कानूनी जोखिम का सामना करना पड़ता है। इस मुद्दे पर कई मामलों ने चर्चा को और तेज कर दिया है।
- 01MTP कानून महिलाओं की स्वायत्तता की बजाय डॉक्टरों की मंजूरी पर निर्भर है।
- 02नाबालिग दुष्कर्म पीड़िताओं के मामलों में कानूनी जटिलताएँ बढ़ जाती हैं।
- 03सुप्रीम कोर्ट ने असाधारण परिस्थितियों में देर से गर्भपात की अनुमति दी है।
- 04MTP एक्ट की भाषा कानूनी व्याख्या में भ्रम पैदा करती है।
- 05महिलाओं को गर्भपात का निर्णय लेने में अधिक अधिकार मिलने की आवश्यकता है।
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मुंबई में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट को लेकर हाल में अदालतों और चिकित्सा समुदाय के बीच बहस तेज हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा कानून महिलाओं की स्वायत्तता को प्राथमिकता देने के बजाय डॉक्टरों की मंजूरी को महत्व देता है, जिससे डॉक्टरों को कानूनी जोखिम का सामना करना पड़ता है। हाल ही में सतारा सिविल अस्पताल की एक स्त्री रोग विशेषज्ञ के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई, जब एक 16 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता का गर्भपात असफल रहा। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने 15 वर्षीय पीड़िता का गर्भ समाप्त करने के लिए डॉक्टरों को अवमानना की चेतावनी दी। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में गर्भपात की कानूनी सीमा 20 सप्ताह से बढ़ाकर 24 सप्ताह करने के बावजूद, यह कानून अभी भी डॉक्टर-केंद्रित है। जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल की प्रोफेसर दीपिका जैन ने कहा कि गर्भपात को अपराध की श्रेणी से बाहर करना चाहिए और अंतिम निर्णय महिला का होना चाहिए। नाबालिग दुष्कर्म पीड़िताओं के मामलों में यह समस्या और गंभीर हो जाती है, क्योंकि गर्भपात केवल तब ही संभव है जब महिला की जान को खतरा हो या भ्रूण में गंभीर असामान्यता हो। इस प्रकार, विशेषज्ञों ने MTP एक्ट की भाषा और उसकी जटिलताओं पर भी सवाल उठाए हैं।
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इस मुद्दे का प्रभाव महिलाओं के स्वास्थ्य और कानूनी सुरक्षा पर पड़ता है, खासकर दुष्कर्म पीड़िताओं के लिए।
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