हिमालयी ग्लेशियरों पर चरम मौसम का गहरा असर: आईआईटी इंदौर का अध्ययन
हिमालयी ग्लेशियरों पर चरम मौसम का प्रभाव: आईआईटी इंदौर के अध्ययन ने चौंकाया
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आईआईटी इंदौर के एक अध्ययन में पाया गया है कि हिमालयी ग्लेशियरों पर चरम मौसमीय घटनाओं का गहरा प्रभाव पड़ रहा है। 2021-22 में भीषण गर्मी के कारण ग्लेशियरों का पिघलना तेज हुआ, जबकि 2022-23 में भारी बर्फबारी ने स्थिति को कुछ हद तक सुधारने में मदद की। हालांकि, वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह सुधार अस्थायी है और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव लगातार बढ़ रहे हैं।
- 01हिमालयी ग्लेशियरों पर चरम मौसम का गहरा असर पड़ रहा है।
- 022021-22 में गर्मी के कारण ग्लेशियरों का पिघलना तेजी से हुआ।
- 032022-23 में भारी बर्फबारी ने स्थिति को कुछ हद तक सुधारने में मदद की।
- 04वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह सुधार अस्थायी है।
- 05ग्लेशियर हर वर्ष औसतन 0.47 मीटर जल-समतुल्य द्रव्यमान खो रहे हैं।
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आईआईटी इंदौर के शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन में बताया है कि हिमालयी ग्लेशियरों पर चरम मौसमीय घटनाओं का प्रभाव बढ़ रहा है। अध्ययन में छोटा शिगरी ग्लेशियर का विश्लेषण किया गया, जिसमें 2021-22 में भीषण गर्मी के कारण ग्लेशियर का पिघलना तेज हुआ, जिससे उसका 'सबसे नकारात्मक मास बैलेंस' दर्ज किया गया। इसके विपरीत, 2022-23 में भारी बर्फबारी ने ग्लेशियर की सतह को उजला बना दिया, जिससे उसकी पिघलने की दर धीमी पड़ गई। हालांकि, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह सुधार अस्थायी है और जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों का सिकुड़ना जारी है। अध्ययन के अनुसार, यदि वार्षिक तापमान में हर 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है, तो ग्लेशियर को स्थिर बनाए रखने के लिए 80 मिमी अतिरिक्त ग्रीष्मकालीन बर्फबारी की आवश्यकता होगी। यह अध्ययन जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों की ओर इशारा करता है।
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ग्लेशियरों के पिघलने की गति और उनके स्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव स्थानीय पर्यावरण और जल संसाधनों पर गंभीर असर डाल सकता है।
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