डॉ. नारायण व्यास: भारतीय धरोहरों के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान
मिट्टी से स्मृति तक: धरोहरों को पहचान दिलाने की यात्रा के प्रतीक डॉ. नारायण व्यास
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डॉ. नारायण व्यास, उज्जैन के वरिष्ठ पुरातत्वविद्, ने भारतीय धरोहरों के संरक्षण और अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने रानी की वाव जैसे विश्व धरोहर स्थलों के उत्खनन और संरक्षण में योगदान दिया और भारतीय पुरातत्व को समाज से जोड़ा।
- 01डॉ. नारायण व्यास ने रानी की वाव के उत्खनन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- 02उन्होंने भारतीय पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण को नई दिशा दी।
- 03उनकी शोध और कार्यशालाएं विद्यार्थियों में जागरूकता फैलाने में सहायक रही हैं।
- 04डॉ. व्यास ने शैलचित्रों को मानव सभ्यता की प्रारंभिक अभिव्यक्ति के रूप में स्थापित किया।
- 05उनका योगदान केवल अकादमिक दायरे तक सीमित नहीं, बल्कि समाज में भी महत्वपूर्ण है।
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डॉ. नारायण व्यास, उज्जैन के वरिष्ठ पुरातत्वविद्, ने भारतीय धरोहरों के संरक्षण और अध्ययन में अनूठा योगदान दिया है। 77 वर्षीय डॉ. व्यास ने 1972 में शासकीय सेवा में प्रवेश किया और 2009 में अधीक्षण पुरातत्वविद् के पद से सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के साथ मध्य प्रदेश, गुजरात सहित कई राज्यों में महत्वपूर्ण स्थलों पर कार्य किया। रानी की वाव के उत्खनन में उनकी भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। उन्होंने शैलचित्रों के अध्ययन में भी महत्वपूर्ण कार्य किए, जिन्हें उन्होंने मानव सभ्यता की प्रारंभिक अभिव्यक्ति के रूप में देखा। उनके कार्यों ने धरोहरों के संरक्षण को नई दिशा दी और उन्होंने विद्यार्थियों को जागरूक करने के लिए कई कार्यशालाएं आयोजित कीं। डॉ. व्यास की पुस्तकें और शोध आज विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण आधार हैं।
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डॉ. व्यास के कार्यों ने न केवल भारतीय धरोहर के संरक्षण को बढ़ावा दिया है, बल्कि विद्यार्थियों में जागरूकता भी फैलाई है।
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