भोजशाला का ऐतिहासिक महत्व: एक और दस्तावेज में सरस्वती मंदिर होने का उल्लेख
एक और ऐतिहासिक दस्तावेज में उल्लेख, भोजशाला वास्तव में सरस्वती मंदिर
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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में भोजशाला के धार्मिक स्वरूप पर सुनवाई के दौरान एक ऐतिहासिक दस्तावेज सामने आया है, जिसमें इसे मूलतः सरस्वती मंदिर बताया गया है। ब्रिटिश इतिहासकार सीई लुआर्ड की पुस्तक में इस स्थल के हिंदू मंदिर के रूप में होने का उल्लेख है, जो 11वीं-12वीं सदी से जुड़ा है।
- 01भोजशाला को मूलतः सरस्वती मंदिर बताया गया है।
- 02सीई लुआर्ड की पुस्तक में इस स्थल का ऐतिहासिक महत्व दर्शाया गया है।
- 03मंदिर के अवशेषों का उपयोग कर मस्जिद का निर्माण किया गया।
- 04संस्कृत व्याकरण से जुड़े शिलालेख इस स्थल की पहचान बनाते हैं।
- 05भोजशाला केवल पूजा का केंद्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जीवन का प्रमुख केंद्र भी थी।
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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में भोजशाला के धार्मिक स्वरूप पर सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण दस्तावेज सामने आया है। ब्रिटिश इतिहासकार सीई लुआर्ड ने अपनी पुस्तक 'धार एंड मांडू' में भोजशाला को मूलतः हिंदू मंदिर बताया है, जो संभवतः सरस्वती को समर्पित था। यह पुस्तक 1912 में प्रकाशित हुई थी और इसमें उल्लेख है कि भोजशाला का वर्तमान ढांचा 11वीं-12वीं सदी के हिंदू मंदिर से जुड़ा है। लुआर्ड ने इस स्थल के भीतर मिले संस्कृत व्याकरण से जुड़े शिलालेखों को इस स्थल की विशेष पहचान बताया है, जो यहां दी गई व्यवस्थित शिक्षा का संकेत देते हैं। इसके अलावा, भोजशाला का सांस्कृतिक महत्व भी उजागर होता है, क्योंकि इसे उस समय के सांस्कृतिक जीवन का प्रमुख केंद्र माना गया है। यह दस्तावेज़ इस बात को और मजबूत करता है कि भोजशाला वास्तव में एक धार्मिक स्थल था, जो बाद में बदलकर मस्जिद में परिवर्तित हो गया।
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इस दस्तावेज़ से भोजशाला के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को फिर से स्थापित करने में मदद मिलेगी, जो स्थानीय समुदाय के लिए महत्वपूर्ण है।
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