झारखंड हाई कोर्ट का फैसला: कर्मचारियों का स्थानांतरण दंड के रूप में नहीं किया जा सकता
कर्मचारियों का स्थानांतरण दंड के तौर पर नहीं कर सकते, झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

Image: Jagran
झारखंड हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि सरकारी कर्मचारियों का स्थानांतरण दंडात्मक कार्रवाई के रूप में नहीं किया जा सकता। अदालत ने देवघर के दो शिक्षकों के स्थानांतरण आदेश को निरस्त करते हुए उन्हें उनके मूल पद पर बहाल करने का आदेश दिया है।
- 01अदालत ने 19 जनवरी 2026 के स्थानांतरण आदेश को निरस्त किया है।
- 02प्रार्थी सुशील कुमार यादव 48 प्रतिशत दिव्यांग हैं और उन्हें बोकारो स्थानांतरित किया गया था।
- 03श्रीकांत मंडल का स्थानांतरण उनकी पत्नी के साथ संबंध के आधार पर अवैध था।
- 04अदालत ने कहा कि स्थानांतरण दंडात्मक कार्रवाई के रूप में अवैध है।
- 05सरकार को शिकायतों के आधार पर अनुशासनिक कार्रवाई करने का अधिकार है, लेकिन स्थानांतरण के रूप में नहीं।
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झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारियों का स्थानांतरण दंड के रूप में नहीं किया जा सकता। अदालत ने देवघर जिले के दो शिक्षकों, सुशील कुमार यादव और श्रीकांत मंडल, के स्थानांतरण आदेश को निरस्त करते हुए उन्हें उनके मूल पद पर बहाल करने का आदेश दिया है। सुशील कुमार यादव, जो 48 प्रतिशत दिव्यांग हैं, को बोकारो स्थानांतरित किया गया था, जबकि श्रीकांत मंडल का स्थानांतरण उनकी पत्नी के साथ संबंध के आधार पर गलत था। अदालत ने यह पाया कि स्थानांतरण प्रशासनिक जरूरतों के बजाय दंडात्मक कार्रवाई के तहत किया गया था। सरकार के नियमों के अनुसार, दिव्यांग कर्मचारियों को उनके जिले में ही पोस्टिंग दी जानी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि यदि विभाग को किसी शिक्षक के खिलाफ शिकायत है, तो उसे अनुशासनिक कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन स्थानांतरण के माध्यम से सजा नहीं दी जा सकती।
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इस निर्णय से दिव्यांग कर्मचारियों और उनके परिवारों को न्याय मिलेगा और उन्हें उनके अधिकारों की रक्षा होगी।
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