रेवड़ी राजनीति: विकास में बाधा और वितरणात्मक न्याय की आवश्यकता
विचार: विकास को बाधित करती रेवड़ी राजनीति

Image: Jagran
हाल के चुनावों में राजनीतिक दलों ने रेवड़ी संस्कृति को बढ़ावा दिया है, जिससे समृद्धि और विषमता में वृद्धि हो रही है। विश्व बैंक के अनुसार, 82.6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। वितरणात्मक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक है ताकि समाज में समानता और विकास सुनिश्चित किया जा सके।
- 0182.6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं, जिनकी दैनिक आय तीन डॉलर से कम है।
- 022018-19 की तुलना में 2025-26 के बीच बिना शर्त हस्तांतरणों का दायरा 28.8 प्रतिशत बढ़ा है।
- 03अमर्त्य सेन और मार्था नुसबाम का 'क्षमता दृष्टिकोण' न्याय की नई परिभाषा प्रस्तुत करता है।
- 04दक्षिण कोरिया और जर्मनी ने शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित कर विषमता को कम किया।
- 05भारत में रेवड़ी योजनाओं के कारण बुनियादी ढांचे में निवेश की कमी हो रही है।
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हाल के चुनावों के बाद, राजनीतिक दलों ने रेवड़ी संस्कृति को बढ़ावा दिया है, जिससे समृद्धि और विषमता के बीच की खाई और चौड़ी हो रही है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 82.6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। इस संदर्भ में वितरणात्मक न्याय की आवश्यकता है, जो केवल आर्थिक पुनर्वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि अवसरों और संसाधनों के न्यायसंगत आवंटन को भी सुनिश्चित करता है। अमर्त्य सेन और मार्था नुसबाम का 'क्षमता दृष्टिकोण' इस दिशा में एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। उदाहरण के लिए, दक्षिण कोरिया ने शिक्षा और तकनीकी विकास पर ध्यान केंद्रित कर विषमता को कम किया। भारत में, रेवड़ी योजनाओं के कारण बुनियादी ढांचे में निवेश की कमी हो रही है, जिससे दीर्घकालिक विकास प्रभावित हो रहा है। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे रेवड़ी संस्कृति से हटकर प्रभावी वितरणात्मक न्याय की दिशा में कदम बढ़ाएं।
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रेवड़ी योजनाओं के कारण राज्यों में बुनियादी ढांचे में निवेश की कमी हो रही है, जिससे विकास प्रभावित हो रहा है।
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