देहरादून में जैकारांडा के आगमन का इतिहास और महत्व
देहरादून में कौन लेकर आया था नीला गुलमोहर, कहां से आया था भारत
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जैकारांडा (Jacaranda) पेड़, जिसे औपनिवेशिक काल में ब्रिटिशों द्वारा उत्तराखंड लाया गया था, का इतिहास और महत्व बताया गया है। यह पेड़ 1841 में कोलकाता के बॉटनिकल गार्डन के जरिए भारत आया और डॉ. विलियम जेमिसन ने इसे उत्तर भारत में फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- 01जैकारांडा का भारत में आगमन 1841 में हुआ था।
- 02डॉ. विलियम जेमिसन ने जैकारांडा के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- 03जैकारांडा के फूल मार्च के अंत से मई की शुरुआत तक खिलते हैं।
- 04यह पेड़ देहरादून की औपनिवेशिक विरासत का प्रतीक है।
- 05स्थानीय लोग इसे 'प्रकृति का बैंगनी उत्सव' मानते हैं।
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जैकारांडा (Jacaranda) पेड़, जिसे औपनिवेशिक काल में ब्रिटिशों द्वारा सजावटी पेड़ के रूप में उत्तराखंड में लाया गया, का भारत में आगमन 1841 में कोलकाता के बॉटनिकल गार्डन के माध्यम से हुआ था। इसे डॉ. विलियम जेमिसन (Scottish surgeon and botanist) ने उत्तर भारत में फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जेमिसन ने सहारनपुर बॉटनिकल गार्डन में जैकारांडा के पौधों को उगाने और वितरित करने का कार्य किया। उन्होंने इसे दून घाटी और निचले हिमालयी क्षेत्रों की जलवायु के लिए उपयुक्त पाया। आज, देहरादून के डालनवाला क्षेत्र में लगे जैकारांडा के पेड़ इस शहर की औपनिवेशिक विरासत का प्रतीक हैं। मार्च के अंत से मई की शुरुआत तक इन पेड़ों पर खिलने वाले बैंगनी फूल स्थानीय निवासियों द्वारा 'प्रकृति का बैंगनी उत्सव' के रूप में मनाए जाते हैं।
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जैकारांडा के पेड़ देहरादून की सुंदरता बढ़ाते हैं और स्थानीय निवासियों के लिए प्राकृतिक सौंदर्य का स्रोत हैं।
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