सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक प्रथाओं के मानक तय करने में कठिनाई पर जताई चिंता
'न्यायपालिका के लिए धार्मिक प्रथा का मापदंड तय करना मुश्किल', सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि न्यायिक मंचों के लिए किसी धार्मिक प्रथा को आवश्यक या गैर-आवश्यक घोषित करना कठिन है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक प्रथाओं का संरक्षण तब तक है जब तक वे नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ न हों।
- 01सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक प्रथाओं के मानक तय करने में कठिनाई जताई।
- 02किसी धार्मिक प्रथा को आवश्यक घोषित करना न्यायिक मंचों के लिए मुश्किल है।
- 03संविधान के तहत धार्मिक प्रथाओं का संरक्षण तब तक है जब तक कि वे सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ न हों।
- 04सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले में महिलाओं के प्रवेश के अधिकार पर चर्चा की।
- 05अनुच्छेद 25 (2) (ख) सामाजिक कल्याण के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि किसी धार्मिक प्रथा को न्यायिक मंचों पर आवश्यक या गैर-आवश्यक घोषित करना बहुत कठिन है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने यह टिप्पणी तब की जब सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई चल रही थी। न्यायालय ने कहा कि संविधान के तहत धार्मिक प्रथाओं का संरक्षण तब तक है जब तक वे नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था और स्वास्थ्य के खिलाफ न हों। वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता में अनुयायियों द्वारा तय की गई प्रथाएं शामिल होती हैं। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने अनुच्छेद 25 (2) (ख) का उल्लेख करते हुए कहा कि यह राज्य को सामाजिक कल्याण के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
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इस निर्णय का प्रभाव धार्मिक प्रथाओं और महिलाओं के अधिकारों पर पड़ेगा, विशेषकर उन प्रथाओं पर जो सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित हैं।
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