ज्येष्ठ मास का महत्व: वृन्दारक की कथा और पुण्यदायी कार्य
Skand Purana: ज्येष्ठ मास के कार्य हैं बेहद पुण्यदायी, पढ़ें वृन्दारक की रोचक कथा
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ज्येष्ठ मास को सनातन धर्म में पुण्यदायक माना गया है। स्कन्द पुराण के अनुसार, इस मास में स्नान, व्रत और जलदान करने से पापों से मुक्ति मिलती है। वृन्दारक की कथा में भगवान विष्णु ने उसे ज्येष्ठ मास में व्रत करने का उपदेश दिया, जिससे उसे संतान सुख प्राप्त हुआ।
- 01ज्येष्ठ मास में स्नान, व्रत और जलदान से पापों से मुक्ति मिलती है।
- 02वृन्दारक ने संतान सुख के लिए तपस्या की और भगवान विष्णु से मार्गदर्शन प्राप्त किया।
- 03भगवान विष्णु ने वृन्दारक को ज्येष्ठ मास में विशेष व्रत करने का निर्देश दिया।
- 04वृन्दारक ने अपने व्रत का पुण्य एक भूखे बाघ को अर्पित किया।
- 05उस पुण्य के प्रभाव से बाघ ने स्वर्गलोक प्राप्त किया और वृन्दारक को एक भक्त पुत्र मिला।
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सनातन धर्म में ज्येष्ठ मास को अत्यंत पुण्यदायक माना गया है। स्कन्द पुराण के अनुसार, इस मास में प्रातःकाल स्नान, भगवान विष्णु की उपासना, जलदान और संयमपूर्वक व्रत करने से मनुष्य को अनेक पापों से मुक्ति मिलती है। वृन्दारक नामक एक ब्राह्मण की कथा में, जो संतानहीन था, भगवान विष्णु ने उसे ज्येष्ठ मास में विशेष व्रत करने का उपदेश दिया। वृन्दारक ने तपस्या की और भगवान की कृपा से व्रत का पालन किया। एक दिन, उसने एक भूखे बाघ को जलदान किया, जिससे बाघ ने दिव्य स्वरूप धारण किया और वृन्दारक से अपने पूर्व जन्म की कहानी बताई। बाघ ने वृन्दारक से उसके व्रत का पुण्य दान करने की प्रार्थना की, जिसे उसने दयालुता से स्वीकार किया। इस पुण्य के प्रभाव से बाघ स्वर्गलोक को चला गया और वृन्दारक को एक भक्त पुत्र प्राप्त हुआ।
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