मनोज बाजपेयी: बिहार के छोटे गांव से बॉलीवुड के सुपरस्टार तक का सफर
बिहार का वो 'लाल', एनएसडी से 3 बार रिजेक्ट होने के बाद नहीं मानी हार, छोटे से रोल ने चमका दी किस्मत
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मनोज बाजपेयी, बिहार के बेलवा गांव में जन्मे, ने तीन बार नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में असफल रहने के बावजूद हार नहीं मानी। छोटे रोल से शुरुआत कर उन्होंने 'सत्या' जैसी फिल्मों में अपनी अदाकारी से पहचान बनाई और आज एक सफल अभिनेता हैं।
- 01मनोज बाजपेयी का जन्म 23 अप्रैल 1969 को बिहार के बेलवा गांव में हुआ था।
- 02उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में तीन बार असफलता का सामना किया।
- 03फिल्म 'बैंडिट क्वीन' में छोटे रोल से करियर की शुरुआत की।
- 04राम गोपाल वर्मा ने उन्हें 'सत्या' में 'भीखू म्हात्रे' का किरदार दिया, जिससे वह सुपरस्टार बने।
- 05मनोज को तीन राष्ट्रीय पुरस्कार और पद्म श्री से सम्मानित किया गया है।
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मनोज बाजपेयी, जो 23 अप्रैल 1969 को बिहार के बेलवा गांव में जन्मे, ने अपने करियर की शुरुआत में कई कठिनाइयों का सामना किया। उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में तीन बार असफलता का सामना किया, लेकिन अपनी मेहनत और लगन से थिएटर में नाम कमाया। मुंबई में छोटे-छोटे रोल करने के बाद, उन्हें शेखर कपूर की फिल्म 'बैंडिट क्वीन' में काम करने का मौका मिला, जिसने उनके करियर की दिशा बदल दी। राम गोपाल वर्मा ने 'दौड़' में उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें 'सत्या' में 'भीखू म्हात्रे' का किरदार दिया, जिसने उन्हें रातों-रात सुपरस्टार बना दिया। मनोज बाजपेयी ने 'शूल', 'पिंजर', 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' और 'अलीगढ़' जैसी फिल्मों में अपने अभिनय से साबित किया कि मेहनत से किसी भी कलाकार को सफलता मिल सकती है। आज भी, 'द फैमिली मैन' जैसी वेब सीरीज के जरिए उनका जादू बरकरार है। उनका सफर हर उभरते कलाकार के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
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मनोज बाजपेयी की कहानी ने बिहार के युवाओं को प्रेरित किया है कि वे अपने सपनों के पीछे मेहनत करें और कठिनाइयों का सामना करें।
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