भारत में शिक्षा में बेटियों का बढ़ता दबदबा: जेंडर गैप खत्म
स्कूल से यूनिवर्सिटी तक अब बेटियों का दबदबा, अब जेंडर गैप हुआ खत्म
Jagran Josh
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भारत में शिक्षा प्रणाली में पिछले कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं, जहां अब प्राइमरी से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक छात्राओं की संख्या छात्रों से अधिक हो गई है। यह 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' के संकल्प की सफलता को दर्शाता है, जिससे लैंगिक समानता में सुधार हुआ है।
- 01प्राइमरी से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक छात्राओं की संख्या छात्रों से अधिक हो गई है।
- 02लैंगिक समानता सूचकांक (GPI) ने 1.0 को पार किया है, जो महिलाओं की उच्च भागीदारी को दर्शाता है।
- 03सरकारी योजनाओं और बेहतर बुनियादी ढांचे ने लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा दिया है।
- 04STEM क्षेत्रों में स्नातक करने वाली महिलाओं का प्रतिशत पश्चिमी देशों से अधिक है।
- 05भविष्य में कार्यबल में समान अवसर सुनिश्चित करना एक बड़ा लक्ष्य है।
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भारत की शिक्षा प्रणाली में हाल के वर्षों में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं, जहां अब प्राइमरी स्कूल से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन स्तर तक छात्राओं की संख्या छात्रों से अधिक हो गई है। टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा उद्धृत 2021-22 के आंकड़ों के अनुसार, लैंगिक समानता सूचकांक (GPI) ने 1.0 को पार कर लिया है, जो महिलाओं की उच्च भागीदारी को दर्शाता है। सरकारी योजनाओं जैसे मुफ्त शिक्षा और छात्रवृत्तियों के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में भी माता-पिता अपनी बेटियों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित हुए हैं। इसके अलावा, स्कूलों में बेहतर बुनियादी ढांचे और सोच में बदलाव ने भी इस स्थिति को बेहतर बनाने में मदद की है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, उच्च शिक्षा में लड़कियों के नामांकन में 32% की वृद्धि हुई है। हालांकि, कार्यबल में उनकी भागीदारी को बढ़ाने की चुनौती अभी भी बनी हुई है। यह प्रवृत्ति भारत के सामाजिक-आर्थिक भविष्य को महत्वपूर्ण रूप से बदल सकती है।
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बेटियों की शिक्षा में यह वृद्धि भारतीय समाज में संरचनात्मक बदलाव का संकेत है, जो भविष्य में कार्यबल और सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रभावित कर सकती है।
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