सावित्रीबाई फुले: महिलाओं की शिक्षा में क्रांति लाने वाली पहली महिला शिक्षिका
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सावित्रीबाई फुले, भारत की पहली महिला शिक्षिका, ने 19वीं सदी में लड़कियों की शिक्षा के लिए संघर्ष किया। उन्होंने न केवल स्कूल खोले, बल्कि समाज में महिलाओं के अधिकारों के लिए भी आवाज उठाई। उनका जीवन और कार्य आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं।
- 01सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र में हुआ था।
- 02उन्होंने लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला, जब समाज महिलाओं की शिक्षा के खिलाफ था।
- 03उनका जीवन संघर्ष और समाज सुधार के लिए समर्पित था।
- 04सावित्रीबाई ने विधवाओं और महिलाओं के अधिकारों के लिए भी काम किया।
- 05उनका योगदान आज भी महिलाओं की शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है।
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सावित्रीबाई फुले (1831-1897) भारतीय समाज में महिलाओं की शिक्षा की पहली आवाज थीं। उन्होंने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर पुणे में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला, जब समाज में महिलाओं की शिक्षा को गलत माना जाता था। उन्हें रास्ते में विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। सावित्रीबाई ने न केवल शिक्षा के क्षेत्र में बल्कि बाल विवाह और जात-पात के खिलाफ भी आवाज उठाई। उन्होंने विधवाओं के लिए आश्रय गृह स्थापित किए और महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाई। उनका जीवन समाज सेवा में समर्पित रहा, और जब प्लेग महामारी फैली, तब भी उन्होंने लोगों की मदद की। 10 मार्च 1897 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका कार्य आज भी लोगों को प्रेरित करता है। सावित्रीबाई फुले की जयंती पर उन्हें सम्मान के साथ याद किया जाता है, और उनके योगदान को नमन किया जाता है।
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सावित्रीबाई फुले के कार्यों ने महिलाओं की शिक्षा में क्रांति ला दी, जिससे आज की लड़कियों को स्कूल और कॉलेज जाने का अवसर मिला।
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