महाराष्ट्र के 23 गांवों ने जनभागीदारी से सूखे पर पाया काबू
जनभागीदारी से 'पानी कमाकर' सूखे को हराने वाले महाराष्ट्र के 23 गांवों की कहानी
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महाराष्ट्र के कासालगंगा नदी बेसिन के 23 गांवों ने केवल सात वर्षों में सूखे पर काबू पाया है। जनभागीदारी, जल साक्षरता और सामुदायिक प्रबंधन के माध्यम से इन गांवों ने जल संरक्षण कार्यों को सफलतापूर्वक लागू किया है। इस प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी और सरकारी मान्यता भी शामिल है।
- 01महूद बुद्रुक गांव ने 2016 में सूखे से उबरना शुरू किया, जिसके बाद अन्य गांवों ने भी इसे अपनाया।
- 02कासालगंगा नदी बेसिन में जल संरक्षण कार्यों के कारण 70-75% क्षेत्र अब सिंचाई के अंतर्गत आ गया है।
- 03महूद बुद्रुक को 2019 में राष्ट्रीय जल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
- 04किसानों ने जल साक्षरता के माध्यम से ड्रिप सिंचाई को अपनाया, जिससे फसल उत्पादन में वृद्धि हुई।
- 05महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों की संख्या 20 से बढ़कर 100 से अधिक हो गई है, जिससे आर्थिक सशक्तिकरण में मदद मिली।
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महाराष्ट्र के कासालगंगा नदी बेसिन के 23 गांवों ने जनभागीदारी और जल साक्षरता के माध्यम से सूखे पर काबू पाया है। 2016 में महूद बुद्रुक गांव ने जल विकास कार्य शुरू किया, जिसके बाद अन्य गांवों ने भी इसे अपनाया। इन गांवों ने जल संरक्षण के लिए सामुदायिक प्रयास किए, जिससे 70-75% क्षेत्र सिंचाई के अंतर्गत आ गया है। महूद बुद्रुक को 2019 में राष्ट्रीय जल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। किसानों ने ड्रिप सिंचाई को अपनाया है, जिससे फसल उत्पादन में वृद्धि हुई है। इसके अलावा, महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों की संख्या में वृद्धि हुई है, जिससे आर्थिक सशक्तिकरण में मदद मिली है। इस प्रक्रिया ने गांवों को आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर किया है।
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कासालगंगा नदी बेसिन के गांवों में जल संरक्षण कार्यों ने कृषि उत्पादन में वृद्धि की है, जिससे ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है।
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