NEET परीक्षा के पेपर लीक पर चिंता, 2016 से पहले डॉक्टर बनने की प्रक्रिया
2016 से शुरू हुई NEET परीक्षा, पहले बिना कॉमन एंट्रेंस के कैसे बनते थे डॉक्टर?
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नीट परीक्षा के पेपर लीक मामले ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। अगले साल से यह परीक्षा कंप्यूटर आधारित होगी। 2016 से पहले, मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश कक्षा 12वीं के अंकों और विभिन्न राज्य स्तरीय परीक्षाओं के माध्यम से होता था, जबकि अब NEET के माध्यम से प्रवेश लिया जाता है।
- 01नीट परीक्षा की शुरुआत आधिकारिक रूप से 5 मई 2013 को हुई थी, लेकिन इसे स्थगित कर दिया गया था।
- 022016 से पहले, मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए छात्रों को विभिन्न राज्य स्तरीय प्री-मेडिकल टेस्ट देना पड़ता था।
- 03कक्षा 12वीं के अंकों के आधार पर छात्रों का चयन किया जाता था।
- 04सीबीएसई द्वारा आयोजित ऑल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट (AIPMT) के तहत सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 15% सीटें आरक्षित होती थीं।
- 05अगले साल से नीट परीक्षा कंप्यूटर आधारित होगी, जिससे पेपर लीक की घटनाओं में कमी आने की उम्मीद है।
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हाल ही में नीट परीक्षा के पेपर लीक मामले ने इसकी विश्वसनीयता को चुनौती दी है। लाखों छात्रों और अभिभावकों में चिंता बढ़ी है कि जो परीक्षा निष्पक्षता का प्रतीक मानी जाती थी, वह अब धांधली और अनियमितताओं के आरोपों में घिरी हुई है। इस समस्या को देखते हुए, सरकार ने अगले साल से नीट परीक्षा को कंप्यूटर आधारित करने का निर्णय लिया है। इससे पेपर लीक जैसी घटनाओं पर रोक लगाने की उम्मीद है।
2016 से पहले, भारत में डॉक्टर बनने के लिए कोई कॉमन एंट्रेंस एग्जाम नहीं होता था। छात्रों का चयन कक्षा 12वीं के अंकों के आधार पर होता था और उन्हें विभिन्न राज्य स्तरीय प्री-मेडिकल टेस्ट जैसे RPMT, MP-PMT, और CPMT में भाग लेना पड़ता था। 2016 में नीट की शुरुआत के बाद, यह परीक्षा मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश का एक प्रमुख माध्यम बन गई है।
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नीट परीक्षा का कंप्यूटर आधारित होना छात्रों के लिए परीक्षा प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित बनाएगा।
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