दक्षिण के राज्यों का परिसीमन विरोध: संवैधानिक आवश्यकताएँ और राजनीतिक परिणाम
परिसीमन का विरोध कर अपना ही नुकसान तो नहीं कर रहे हैं दक्षिण के राज्य? क्या है संवैधानिक व्यवस्था
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा लाए गए परिसीमन विधेयक का विरोध दक्षिणी राज्यों में हो रहा है, जिसका मुख्य कारण महिला आरक्षण और जनसंख्या के अनुपात में सीटों का पुनर्वितरण है। यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 के तहत अनिवार्य है, लेकिन इसके राजनीतिक परिणाम दूरगामी हो सकते हैं।
- 01परिसीमन विधेयक का उद्देश्य महिला आरक्षण के लिए संसदीय क्षेत्रों की संख्या को फिर से निर्धारित करना है।
- 02संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 के तहत जनगणना के बाद परिसीमन अनिवार्य है।
- 03दक्षिणी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि के कारण सीटों का नुकसान हो सकता है।
- 04विपक्ष का विरोध तार्किक और संवैधानिक नहीं है, जिससे राजनीतिक विभाजन बढ़ सकता है।
- 05महिला आरक्षण केवल आरक्षण देने से नहीं, बल्कि सामान्य महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने से होगा।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा पेश किया गया परिसीमन विधेयक, जो महिला आरक्षण से जुड़ा है, पहली बार सदन में गिर गया है। संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 के अनुसार, जनगणना के बाद परिसीमन अनिवार्य है, जिससे सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व मिल सके। वर्तमान में, लोकसभा की सीटों की संख्या 543 है, जिसे 2026 तक स्थगित किया गया है। इस विधेयक के तहत, दक्षिणी राज्यों को जनसंख्या के अनुपात में सीटों का नुकसान हो सकता है, खासकर तमिलनाडु को। विपक्ष ने इस विधेयक का विरोध किया है, लेकिन यह संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसे लागू करना सरकार की जिम्मेदारी है। महिला आरक्षण विधेयक में अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण का प्रावधान है, लेकिन धर्म के आधार पर आरक्षण की मांग ग़ैर संवैधानिक है। यह विधेयक महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बढ़ाने का अवसर है, लेकिन इसे केवल राजनीतिक परिवारों तक सीमित नहीं होना चाहिए। यदि यह विधेयक पारित नहीं होता है, तो यह भारतीय राज्य की महिलाओं के प्रति प्रतिबद्धता पर प्रश्न चिह्न खड़ा करेगा।
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यदि परिसीमन विधेयक पारित नहीं होता है, तो यह दक्षिणी राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है।
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