29 साल बाद न्याय: पुलिस कस्टडी में मौत के मामले में फर्जी प्राथमिकी का खुलासा
Varanasi News: पुलिस कस्टडी में मौत के बाद कराई थी 100 रुपये की चोरी की प्राथमिकी, 29 साल बाद मिला न्याय

Image: Amar Ujala
वाराणसी में 29 साल पहले पुलिस कस्टडी में हुई मृत्यु के मामले में फर्जी प्राथमिकी दर्ज की गई थी। जांच में पता चला कि आरोपित राजेंद्र प्रसाद सिंह की गिरफ्तारी और उसके बाद की घटनाएँ पूरी तरह से झूठी थीं।
- 01राजेंद्र प्रसाद सिंह को 1997 में पुलिस ने हिरासत में लिया था, लेकिन गिरफ्तारी के दस्तावेज नहीं मिले।
- 02जांच में पाया गया कि पुलिस द्वारा प्रस्तुत आत्महत्या की कहानी झूठी थी, क्योंकि न तो शॉल मिली और न ही स्टूल।
- 03प्राथमिकी में दर्ज दयाराम नाम का व्यक्ति काल्पनिक पाया गया, जिसका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं था।
- 04जांच टीम ने मतदाता सूची से पुष्टि की कि दयाराम और मुकदमा संख्या 12/1997 में वादी बनाए गए दयाराम अलग-अलग व्यक्ति थे।
- 05पुलिस रिकॉर्ड और वास्तविक घटनाक्रम के बीच गंभीर विरोधाभास पाए गए।
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वाराणसी में 1997 में पुलिस कस्टडी में हुई राजेंद्र प्रसाद सिंह की मृत्यु के मामले में एक फर्जी प्राथमिकी का खुलासा हुआ है। जांच में यह पाया गया कि राजेंद्र को सुंदरपुर पुलिस चौकी में हिरासत में लिया गया था, लेकिन गिरफ्तारी के संबंध में कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे। पुलिस ने आत्महत्या की जो कहानी बनाई थी, वह भी झूठी निकली, क्योंकि न तो शॉल मिली और न ही उस स्टूल का कोई पता चला, जिस पर खड़े होकर आत्महत्या का दावा किया गया था। जांच के दौरान, दयाराम नामक व्यक्ति का अस्तित्व काल्पनिक पाया गया। जांच अधिकारी ने यह भी बताया कि सामान्य डायरी में राजेंद्र का कोई विवरण नहीं था। इस मामले में पुलिस रिकॉर्ड और वास्तविक घटनाक्रम के बीच गंभीर विरोधाभासों का पता चला है।
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इस मामले से वाराणसी में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं और न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं।
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