महाशक्तियों की शिखर बैठकः ट्रम्प की चीन यात्रा
The Hindu
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जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ दो-दिवसीय बातचीत के बाद शुक्रवार को बीजिंग से रवाना हुए, तो दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतें एक अस्थायी संघर्ष विराम पर पहुंचती दिखीं। यह कितने दिन चलेगा, यह देखा जाना बाकी है। खासकर, यह देखते हुए कि शिखर बैठक संबंधों में तनाव बनाए रखने वाले मतभेदों - व्यापार से लेकर ताइवान तक- की लंबी सूची पर बिना किसी स्पष्ट प्रगति के समाप्त हुई। इसके बजाय, दोनों पक्ष अपने संबंधों में कुछ स्थिरता लाने पर फोकस करते दिख रहे हैं जिनमें हाल में कई उतार-चढ़ाव देखे गये हैं। शी ने ट्रम्प के कार्यकाल के बचे हुए सालों और उसके बाद के लिए भी “रणनीतिक स्थिरता के एक रचनात्मक रिश्ते” का आह्वान करते हुए, संबंधों के लिए एक नये लेबल की पेशकश की। अगर दोनों नेता कुछ स्थिरता की जरूरत पर सहमत हैं, तो उनकी प्राथमिकताएं भिन्न नजर आती हैं। शी ने ट्रम्प से कहा कि इस रिश्ते में ताइवान सबसे अहम मुद्दा है, जो ठीक से नहीं संभाले जाने पर संघर्ष का रूप ले सकता है। ताइवान पर अमेरिकी रुख अपरिवर्तित है, जिसमें काफी तादाद में हथियारों की बिक्री भी शामिल है। यह देखना बाकी है कि यह संबंध-सुधार ट्रम्प प्रशासन द्वारा अगली बिक्री से किस तरह पेश आयेगा। ट्रम्प के लिए, संबंधों की सेहत के प्रमुख मापक ये हैं कि चीन ज्यादा अमेरिकी माल खरीदे और दुर्लभ मृदा तत्वों पर नियंत्रण ढीला करे। उन्होंने कहा कि बीजिंग 200 बोइंग विमान खरीदने, सोयाबीन की खरीद बढ़ाने, और अमेरिकी बीफ निर्यात पर पाबंदियों में ढील के लिए सहमत है- ये “तीन बी” हैं जिन पर उन्होंने जोर दिया है। अमेरिका ने 10 चीनी फर्मों को उन्नत एनवीडिया चिप की खरीदारी बहाल करने की इजाजत भी दे दी है। दोनों पक्षों ने व्यापार संबंधी मुद्दों, जिनमें कुछ चीनी वस्तुओं पर टैरिफ घटाना शामिल है, को देखने के लिए एक बोर्ड ऑफ ट्रेड, और गैर-संवेदनशील क्षेत्रों में चीनी निवेश को हरी झंडी देने के लिए एक बोर्ड ऑफ इन्वेस्टमेंट स्थापित करने पर चर्चा की है। अगर इन समझौतों पर मुहर लगती है तो भीषण व्यापार युद्ध पर यथासंभव विराम लग सकता है। हालांकि, बीजिंग शिखर बैठक ने दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतों के बीच संबंधों में व्यापक रूप से बदल रही संरचनात्मक गतिशीलता को याद दिलाने का भी काम किया है। भले आज भी अमेरिका सर्वोपरि सैन्य शक्ति बना हुआ है, वैश्विक प्रभाव चलाने की उसकी क्षमता की सीमाएं उत्तरोत्तर सवालों के घेरे में आ चुकी हैं, खासकर ईरान युद्ध के बाद। जहां तक चीन की बात है, उसने साफ कर दिया है कि वह अपना समय आने का इंतजार करने या अपनी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को छिपाने में अब दिलचस्पी नहीं रखता। जैसा कि शी ने ट्रम्प से कहा, क्या चीन और अमेरिका स्थापित ताकत और उभरती ताकत के बीच अपरिहार्य संघर्ष के ‘थ्यूसीडिडीस ट्रैप’ को टाल सकते हैं और संबंधों का एक नया मॉडल बना सकते हैं? यह सवाल भारत और बाकी की दुनिया के लिए महत्व रखता है, जिन्हें इस प्रतिद्वंद्विता के बीच राह बनानी है। अमेरिकी दबाव के सामने तनकर खड़े होना और साथ ही लगातार ज्यादा आत्मविश्वासी होते चीन के साथ मुश्किल संबंधों को संभालना, आगामी वर्षों में भारत की कूटनीति के लिए दो प्रमुख इम्तिहान होंगे। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और स्वतंत्रता को कमजोर करने के बजाय इसे मजबूत करना ही आगे बढ़ने का सबसे अच्छा रास्ता प्रदान करेगा। Published - May 16, 2026 10:56 am IST
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