धराली आपदा: ग्लोबल वार्मिंग और मोरेन जल संचय का प्रभाव
न बादल फटा, न झील टूटी, श्रीकंठ पर्वत पर मोरेन के नीचे जमा पानी और ग्लोबल वार्मिंग ने मचाई थी तबाही

Image: Ndtv
05 अगस्त 2025 को उत्तरकाशी जिले के धराली में आई विनाशकारी बाढ़ सामान्य बादल फटने या ग्लेशियर झील के फटने से नहीं, बल्कि श्रीकंठ पर्वत के नीचे जमा पानी और ग्लोबल वार्मिंग के कारण हुई। वड़िया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने इस घटना का विस्तृत अध्ययन किया है।
- 01धराली में बाढ़ का मुख्य कारण ग्लोबल वार्मिंग और मोरेन के नीचे जमा पानी था, न कि सामान्य क्लाउडबर्स्ट।
- 02बाढ़ की घटना के समय हर्षिल में केवल 6.5 मिमी वर्षा रिकॉर्ड की गई थी, जबकि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में 108 मिमी वर्षा हुई।
- 03खीर गाड़, तेल गाड़ और भेला गाड़ घाटियों में अस्थायी झीलें बनीं, जो बाद में टूट गईं और बाढ़ का कारण बनीं।
- 041866 में कल्प केदार मंदिर की तस्वीरों से पता चलता है कि यह क्षेत्र सदियों से मलबे वाली बाढ़ झेलता आ रहा है।
- 052013 की केदारनाथ आपदा के बाद भी स्थानीय प्रशासन ने सबक नहीं लिया और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण जारी रखा।
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उत्तरकाशी जिले के धराली में 05 अगस्त 2025 को आई बाढ़ को लेकर वैज्ञानिकों ने नए सबूत प्रस्तुत किए हैं। वड़िया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के अनुसंधान के अनुसार, यह आपदा सामान्य क्लाउडबर्स्ट या ग्लेशियर झील के फटने के कारण नहीं, बल्कि श्रीकंठ पर्वत के नीचे जमा पानी और ग्लोबल वार्मिंग के कारण हुई। इस घटना में तीन नालों में एक साथ बाढ़ आई, जो असामान्य मानी गई। वैज्ञानिकों ने कहा कि 3 से 5 अगस्त के बीच निचले इलाकों में भारी बारिश नहीं हुई, जबकि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बारिश ने अस्थिर मलबे को सक्रिय कर दिया। इस दौरान बने अस्थायी झीलों का दबाव बढ़ने से बाढ़ आई। रिसर्च में यह भी बताया गया कि धराली का प्राचीन कल्प केदार मंदिर इस क्षेत्र में मलबे वाली बाढ़ों का गवाह है। इसके अलावा, स्थानीय प्रशासन ने 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद भी संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण कार्य जारी रखा, जिससे बाढ़ की तीव्रता बढ़ गई।
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इस बाढ़ ने स्थानीय समुदायों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जिससे घरों और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है।
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