भोजासर गांव: 450 साल पुरानी सामाजिक जागरूकता की मिसाल
450 साल पुराने भोजासर की अनोखी कहानी! जहां मृत्युभोज बंद कर शिक्षा को बनाया मिशन, अब प्रदेश के लिए बना मिसाल

Image: News 18 Hindi
झुंझुनू जिले का भोजासर गांव, 450 वर्ष पुराना, सामाजिक सुधारों और शिक्षा के प्रति जागरूकता के लिए जाना जाता है। यहां 1952 से मृत्युभोज पर रोक लगी हुई है। गांव के लोग अब भी सामाजिक मुद्दों पर एकजुट होकर निर्णय लेते हैं, लेकिन विकास के कुछ मामलों में उपेक्षा का सामना कर रहे हैं।
- 01भोजासर गांव ने 1952 से मृत्युभोज पर रोक लगाई है, जिससे सामाजिक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं।
- 02गांव में शिक्षा के प्रति जागरूकता के कारण कई आईएएस, आरएएस और चिकित्सक निकले हैं।
- 03भोजासर का इतिहास स्वतंत्रता और किसान आंदोलनों से जुड़ा हुआ है, जिसमें किसान नेता करणीराम मील का योगदान महत्वपूर्ण रहा।
- 04गांव में 1925 में प्राथमिक विद्यालय की स्थापना हुई, जो उस समय की एक बड़ी उपलब्धि थी।
- 05भोजासर में ऐतिहासिक धरोहरों में श्रीरघुनाथ मंदिर और समाधि भवन शामिल हैं, जो इसकी सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं।
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झुंझुनू जिले के मंडावा क्षेत्र में स्थित भोजासर गांव, जो लगभग 450 वर्ष पुराना है, अपनी प्रगतिशील सोच और सामाजिक जागरूकता के लिए प्रसिद्ध है। इस गांव ने 1952 से मृत्युभोज जैसी सामाजिक कुप्रथा पर रोक लगाई है, जो एक ऐतिहासिक पहल मानी जाती है। ग्रामीणों के अनुसार, यह निर्णय आर्य समाज की प्रेरणा से लिया गया था और इससे समाज में सकारात्मक सोच को बढ़ावा मिला है। भोजासर ने शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं, जहां से कई आईएएस, आरएएस और चिकित्सा पेशेवर निकले हैं। हालांकि, गांव को विकास के कुछ मामलों में उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है, जैसे कि ट्रेनों का रुकना और स्कूल के सामने गंदा पानी। इसके अलावा, भोजासर का इतिहास स्वतंत्रता और किसान आंदोलनों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है, जिसमें किसान नेता करणीराम मील का योगदान महत्वपूर्ण रहा।
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भोजासर गांव में मृत्युभोज पर रोक लगाने से सामाजिक सुधारों को बढ़ावा मिला है, जिससे आर्थिक बोझ कम हुआ है।
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