पर्यावरण संरक्षण: विकास का अनिवार्य हिस्सा
जब सबका पर्यावरण होगा तभी सबका विकास होगा
Aaj Tak
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भारत में पिछले दशक में तेजी से विकास के बावजूद, पर्यावरण की स्थिति चिंताजनक है। हिमालयी क्षेत्र में अंधाधुंध निर्माण कार्यों ने प्राकृतिक आपदाओं को बढ़ावा दिया है। विकास और पर्यावरण को एक साथ संतुलित करना आवश्यक है, अन्यथा आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
- 01भारत ने 2016-2026 के बीच बुनियादी ढांचे में अभूतपूर्व तेजी दिखाई है, लेकिन इसके पर्यावरणीय प्रभाव गंभीर हैं।
- 02उत्तराखंड में चार धाम ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट ने भूस्खलनों और जल संकट को बढ़ाया है।
- 03पर्यावरण प्रभाव आकलन नियमों को कमजोर किया गया है, जिससे स्थानीय समुदायों की आवाज दबाई गई है।
- 04हिमालयी क्षेत्र में संवेदनशीलता को नजरअंदाज कर भारी निर्माण कार्य किया गया है।
- 05पर्यावरण को नष्ट करके किया गया विकास वास्तव में 'प्रायोजित विनाश' है।
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भारत में पिछले एक दशक में आर्थिक प्रगति और बुनियादी ढांचे के विकास ने पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुँचाया है। जल, वायु और भूमि जैसे प्राकृतिक संसाधनों की अनदेखी करते हुए, निर्माण कार्यों ने हिमालयी क्षेत्र को आपदाओं का हॉटस्पॉट बना दिया है। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड में चार धाम ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट ने भूस्खलनों की घटनाओं को बढ़ावा दिया है, जिससे स्थानीय जलस्रोत सूख रहे हैं। पर्यावरण प्रभाव आकलन नियमों में ढील देने के कारण स्थानीय समुदायों की चिंताओं को नजरअंदाज किया गया है। इसके परिणामस्वरूप, भारत के कई शहर प्रदूषण की चपेट में हैं और जल संकट का सामना कर रहे हैं। इस स्थिति को सुधारने के लिए, विकास और पर्यावरण को संतुलित करने की आवश्यकता है। यदि हम अब भी नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियों को एक बंजर और आपदाग्रस्त भारत का सामना करना पड़ेगा।
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पर्यावरणीय नुकसान के कारण स्थानीय जलस्रोत सूख रहे हैं और भूस्खलनों की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
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