झारखंड में धर्म परिवर्तन करने वाले आदिवासियों के आरक्षण पर विवाद, जनजाति सुरक्षा मंच की मांग
झारखंड में धर्म छोड़ने वाले आदिवासियों ने मिले आरक्षण का लाभ, जनजाति सुरक्षा मंच की मांग
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Image: Jagran
झारखंड में जनजाति सुरक्षा मंच ने धर्म परिवर्तन करने वाले आदिवासियों के लिए आरक्षण के लाभ पर सवाल उठाया है। उन्होंने मांग की है कि जो लोग अपनी पारंपरिक संस्कृति का त्याग करते हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं मिलना चाहिए। यह मुद्दा 75 वर्षों से लंबित है।
- 01जनजाति सुरक्षा मंच ने दिल्ली में जनजातीय सांस्कृतिक समागम के दौरान अपनी मांगों को दोहराया।
- 02डॉ. राजकिशोर हांसदा ने कहा कि धर्म परिवर्तन करने वालों को अनुसूचित जनजाति का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
- 03मंच ने 2009-10 में 27.67 लाख हस्ताक्षर एकत्र कर राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा था।
- 04लगभग 12 करोड़ जनजातीय जनसंख्या में से 1.5 से 2 करोड़ लोग ईसाई धर्म में परिवर्तित हो चुके हैं।
- 05मंच ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से मांग की कि इस विषय को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के समक्ष भेजा जाए।
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झारखंड में जनजाति सुरक्षा मंच के प्रतिनिधियों ने दिल्ली में आयोजित जनजातीय सांस्कृतिक समागम में धर्म परिवर्तन करने वाले आदिवासियों के आरक्षण पर सवाल उठाए। मंच के राष्ट्रीय सह संयोजक डॉ. राजकिशोर हांसदा ने कहा कि जो लोग अपनी पारंपरिक जनजातीय आस्था और संस्कृति का त्याग करते हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति का संवैधानिक दर्जा नहीं मिलना चाहिए। उन्होंने बताया कि 2009-10 में 26 राज्यों में 27.67 लाख हस्ताक्षर एकत्र कर राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा गया था। मंच ने यह भी बताया कि लगभग 12 करोड़ जनजातीय जनसंख्या में से 1.5 से 2 करोड़ लोग ईसाई धर्म में परिवर्तित हो चुके हैं और कई लोग अनुसूचित जनजाति आरक्षण के साथ अल्पसंख्यक योजनाओं का भी लाभ उठा रहे हैं, जो कि संवैधानिक समता के खिलाफ है। मंच ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से इस मुद्दे को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के समक्ष भेजने की मांग की है।
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धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जनजाति का लाभ उठाने वाले व्यक्तियों की पहचान और उनके अधिकारों पर यह मुद्दा प्रभाव डाल सकता है।
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