झारखंड में जनजातीय भाषाओं की अनदेखी: जेटेट सूची से हटाने का विवाद
झारखंड जेटेट से भोजपुरी-मैथिली के साथ चार जनजातीय भाषाएं भी हटाई गईं, विरोध एकतरफा क्यों?
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Image: Jagran
झारखंड में चार क्षेत्रीय भाषाओं और चार जनजातीय भाषाओं को जे-टेट की सूची से हटाने के निर्णय पर विवाद बढ़ गया है। जबकि क्षेत्रीय भाषाओं के लिए मंत्रियों ने विरोध किया है, जनजातीय भाषाओं के लिए कोई आवाज नहीं उठाई जा रही है। यह स्थिति राजनीतिक कारणों से उत्पन्न हुई है।
- 01झारखंड में मगही, मैथिली, अंगिका और भोजपुरी जैसी चार क्षेत्रीय भाषाएं जेटेट सूची से हटाई गई हैं।
- 02जनजातीय भाषाओं जैसे असुर, बिरहोर, भूमिज और माल्तो को भी सूची से बाहर किया गया है, लेकिन इनके लिए कोई विरोध नहीं हो रहा है।
- 03भाषा विवाद को लेकर बनी मंत्रियों की कमेटी में जनजातीय समुदाय का कोई प्रतिनिधि नहीं है।
- 04कांग्रेस के दो मंत्रियों ने क्षेत्रीय भाषाओं के मुद्दे पर कैबिनेट बैठक में विरोध किया।
- 05यह विवाद वोट बैंक की राजनीति से प्रभावित प्रतीत होता है।
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झारखंड में हाल ही में चार क्षेत्रीय भाषाओं—मगही, मैथिली, अंगिका और भोजपुरी—को जे-टेट की सूची से हटाने का निर्णय लिया गया है, जिसके खिलाफ कई विधायक और मंत्रियों ने आवाज उठाई है। हालांकि, जनजातीय भाषाओं जैसे असुर, बिरहोर, भूमिज और माल्तो को भी इसी सूची से हटाया गया है, लेकिन इनके लिए कोई विरोध नहीं हो रहा है। यह स्थिति राजनीतिक कारणों से उत्पन्न हुई है, जिसमें वोट बैंक की राजनीति का भी योगदान है। राज्य में भाषा विवाद को लेकर बनी मंत्रियों की कमेटी में जनजातीय समुदाय का कोई प्रतिनिधि नहीं है, जिससे यह चिंता और बढ़ गई है। वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने सभी मंत्रियों की अनुशंसाओं को मुख्यमंत्री के पास भेज दिया है, जिसके बाद कैबिनेट की बैठक में इस पर निर्णय लिया जाएगा। इस प्रकार, झारखंड में भाषा विवाद ने एक नई दिशा ले ली है, जिसमें जनजातीय भाषाओं की अनदेखी की जा रही है।
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इस निर्णय का सीधा प्रभाव झारखंड में भाषाई पहचान और सांस्कृतिक विविधता पर पड़ेगा।
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